ब्राह्मी लिपि और खरोष्ठी लिपि

 ब्राह्मी लिपि -

     ब्राह्मी भारत की अधिकांश लिपियों की जननी है तथा इसका प्रयोग सम्राट अशोक के लेखों में हुआ है।

5 वीं सदी ईसा पूर्व से 350 ईसा पूर्व तक इसका एक ही रूप मिलता है लेकिन बाद में इसके दो विभाजन मिलते हैं -उत्तरी धारा व दक्षिणी धारा

ब्राह्मी लिपि की उत्तरी धारा में गुप्त लिपि, कुटिल लिपि , शारदा और देवनागरी लिपि को रखा गया है ।

दक्षिणी धारा में तेलुगू, कन्नड़, तमिल कलिंग, ग्रंथ, मध्य देसी और पश्चिमी लिपि शामिल है ।

ब्राम्ही लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती थी।

 खरोष्ठी लिपि -

       भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्रों में प्रचलित यह लिपि दाएं से बायें लिखी जाती थी।

इसे विदेशी उद्गम लिपि यानी अरमाइक और सीरियाई लिपि से विकसित माना जाता है।

कुल 37 वर्णो वाली इस लिपि में स्वरों का अभाव था यहां तक की मात्राएं और संयुक्त अक्षर भी नहीं मिलते हैं।

सम्राट अशोक के शाहबाजगढ़ी और मान सेहरा पाकिस्तान स्थित अभिलेखों में खरोष्ठी लिपि का प्रमाण मिलता है।

   जेम्स प्रिंसेस एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के संस्थापक थे  । आधुनिक युग में पहली दफा ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों को पढ़ने के लिए जाने जाते है।

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