चेर वंश

चेर वंश की राजधानी वंजी थी इसे केरल देश भी कहा जाता था। इस  वंश के रोम साम्राज्य के साथ व्यापारिक संबंध थे और रोम शासकों ने अपने व्यापारिक गतिविधियों की रक्षा के लिए यहां पर 2 रेजीमेंट भी स्थापित कर रखी थी शेर शासकों ने चोल शासकों के साथ लगभग 150 ईसवी में लड़ाई लड़ी इस वंश का एसएसवी शासक सेंगुट्टुवन था जिसे लाल चेर भी कहा जाता था।

संगम काल की महत्वपूर्ण तथ्य

                    प्रशासन राजतंत्र आत्मक क्यों वंशानुगत था राज्य का सर्वोच्च न्यायालय राजा की प्रजा और सभा तथा मनोरम होती थी राज्य मंडलों में विभाजित था मंडल नाडु या जिला में तथा नाडु ओरिया गांव में विभाजित था राजस्व का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था इसकी दर उत्पादन का एक ब्रिटिश शासकों के पास पेशेवर सैनिक होते थे एवं सेना प्रमुख को एनाडि की उपाधि दी जाती थी समाज में अपनी स्थिति एवं दास प्रथा प्रचलित थी संगम राज्यों का व्यापार रोम की अतिरिक्त मिश्र अरब चीन और मालदीव के साथ होता था एवं के व्यापारी जहाजों में सोना भर कर लाते थे और बदले में काली मिर्च भरकर ले जाते थे इसलिए काली मिर्च का एक नाम एवनप्रिय पड़ गया था। 

दक्षिण भारती में भारत में मुरूगन की उपासना सबसे प्राचीन था। बाद में मुरगन का नाम सुब्रह्मण्यम हो गया तथा स्कंध कार्तिकेय से इस देवता का एकीकरण हो गया।

चेर वंश की राजधानी वंशी को केरल भी कहा जाता था।

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