भारत सरकार ने वर्ष 1948 में औद्योगिक नीति का पोषण तथा साथ ही मिश्रित अर्थव्यवस्था का प्रारंभ किया। मिश्रित अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद तथा समाजवाद दोनों के गुणों का सम्मिश्रण होता है तथा सरकारी एवं निजी क्षेत्र सह अस्तित्व के साथ कार्य करते हैं। शायद यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश देश अपने विकास के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था का सहारा लेते हैं तथा नियोजन के द्वारा विकासोन्मुख होना चाहते हैं। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि मिश्रित अर्थव्यवस्था में सरकारी एवं नियंत्रित निजी क्षेत्रों के द्वारा नियोजन का संचालन किया जाता है। किसी भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में व्यवसाय के संगठन एवं प्रबंध में विकेंद्रीकरण का आयोजन करना आवश्यक होता है। आधुनिक युग में आर्थिक नियोजन का अभिप्राय केवल आर्थिक प्रगति ही नहीं बल्कि सामाजिक न्याय भी होता है। जहां तक भारत देश में सरकार द्वारा अपनाए जाने वाले आर्थिक नियोजन का प्रश्न है, सरकार की औद्योगिक नीति को उद्योगों का मुख्य रूप से चार भागों में बांट रखा है।
- एकमात्र सरकारी अधिकार वाले उद्योग
- सरकार द्वारा नियंत्रित उद्योग
- सरकारी नियमन एवं नियंत्रण में उद्योग
- निजी क्षेत्र के उद्योग
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि भारतीय मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी तथा सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों को सामान रूप से सम्मान दिया गया है तथा दोनों ही क्षेत्रों को विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास के मार्ग में लाने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारें अपनी अपनी भूमिका निभा रही हैं।
औद्योगिक नीति, औद्योगिक प्रगति और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाए जाती हैं। इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा 30 अप्रैल 1956 को एक नई औद्योगिक नीति प्रस्ताव की घोषणा की गई। इस नीति का उद्देश्य आर्थिक विकास की गति को तेज करना, औद्योगिकरण को तेज करना, भारी उद्योगों का विकास करना, सरकारी क्षेत्र का विकास करना, सरकारी क्षेत्र का निर्माण करना, आय व संपत्ति की असमानता को दूर करना तथा निजी एक अधिकारी और आर्थिक संघकेंद्रण को रोकना आदि निर्धारित किया गया।