बेरोजगारी

 बेरोजगारी का अर्थ

 बेरोजगारी से  आशय रोजगार के लिए उपलब्ध अवसरों की तुलना में श्रमशक्ति की अधिक्य है। बेरोजगारी की परिभाषा के रूप में "कीन्स लिखा है, स्वैच्छिक बेरोजगारी एक ऐसी स्थिति है जिसमें मुद्रा मजदूरी की अपेक्षा मस्तूरी में अपेक्षाकृत वृद्धि होने पर श्रम की सामूहिक पूर्ति चालू होता मजदूरी एवं कुल मांग तुलना में वर्तमान रोजगार की मात्रा अधिक होगी।"

 बेरोजगारी के प्रकार /स्वरूप

सैद्धांतिक आधार पर बेरोजगारी अनेक प्रकार की हो सकती है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि कुछ विशेष प्रकार की बेरोजगारी विकसित देशों में पाई जाती है, तो वहीं कुछ बेरोजगारी विकासशील देशों में पाई जाती है। इसके विभिन्न प्रकारों को इस प्रकार सारणीबध्द किया जा सकता है:-

  1.  संरचनात्मक बेरोजगारी- जब किसी भी देश में अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक ढांचे में परिवर्तन होता है जिसके फलस्वरूप एक क्षेत्र विशेष में कार्यरत श्रमिक दूसरे क्षेत्र या उद्योग में कार्य करने के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते, तो इस प्रकार की बेरोजगारी को संरचनात्मक बेरोजगारी कहा जाता है।
  2.  तकनीकी   बेरोजगारी- जब किसी देश के उद्योगों में स्वचालित मशीन ओं का प्रयोग बढ़ जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप वहां पर कार्यरत मजदूरों से कार्य छिन जाता है, तो इस प्रकार की बेरोजगारी को तकनीकी बेरोजगारी कहते हैं।
  3. चक्रीय बेरोजगारी- चक्रीय बेरोजगारी का यह स्वरूप मुख्य रूप से विकसित देशों में जहां पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पाई जाती है, देखने को मिलता है। इन देशों में मंदीकाल की दशा में कुछ वस्तु की पूर्ति उनकी मांग की तुलना में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है, जिससे अत्यधिक टॉप उपलब्ध होते हैं तथा उद्योग को बंद करना पड़ता है। जिससे बेरोजगारी फैल जाती है और समय बीतने पर पुनः उद्योग चालू हो जाते हैं तथा रोजगार के अवसर बढ़ने से बेरोजगारी कम हो जाती है, इसे चक्रीय बेरोजगारी कहते हैं।
  4.  अर्ध्द   बेरोजगारी- जब योग्य व्यक्ति को उसकी योजना से कम तथा कम समय के लिए कार्य मिलता है, तो इसे अर्ध्द बेरोजगारी कहा जाता है।
  5.  मौसमी   बेरोजगारी - कुछ ऐसे उद्योग होते हैं, जो एक मौसम विशेष पर ही चलते हैं तथा बाकी समय बंद रहते हैं। इस प्रकार के उद्योगों में लगे व्यक्तियों को बाकी समय बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है, जैसे - चीनी उद्योग गर्म कपड़ों का उद्योग आदि।
  6.  शिक्षित   बेरोजगारी- शहरों में आज पढ़े लिखे बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिन्हें अपनी शिक्षा तथा योग्यता के अनुसार कार्य नहीं मिल पाता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह बड़ी समस्या है।
  7.  अदृश्य   बेरोजगारी -  अदृश्य बेरोजगारी उस दशा में होती है, जब किसी कार्य को करने के लिए जितने श्रमिकों की आवश्यकता होती है उससे अधिक व्यक्ति उस कार्य में लगे हुए उस कार्य में लगे प्रतीत होते हैं। उस दशा में कार्य पर लगे आवश्यकता से अधिक व्यक्तियों का योगदान शून्य के बराबर होता है।
  8.  ग्रामीण बेरोजगारी- ग्रामीण क्षेत्रों में उपरोक्त सभी प्रकार की बेरोजगारी पाई जाती है। इस प्रकार की बेरोजगारी की समस्या भारत जैसे कृषि प्रधान देशों में अधिक है। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 10 करोड लोग इस प्रकार की बेरोजगारी के शिकार हैं। 
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