ग्रियर्सन का योगदान

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन की ख्याति भारतीय भाषाओं और साहित्य के विशिष्ट अध्ययन और अनुसंधान कर्ता के रूप में हैं। उनका जन्म आयरलैंड के डबली में हुआ था। उन्होंने 1871 में भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास की जिसके 2 साल बाद भारत में उनकी नियुक्ति हुई। लगभग तीन दशक तक बंगाल और बिहार में विभिन्न उच्च पदों पर उन्होंने काम किया और 1899 में अंतिम तौर पर स्वदेश लौट गए। एक अध्ययन के रूप में उनकी दिलचस्पी कोश विज्ञान, लोक साहित्य, इतिहास, राजनीति, पुरातत्व, मानव विज्ञान, काव्यशास्त्र, भाषा, तुलनात्मक, व्याकरण, धर्म आदि विभिन्न अनुशासन में थी।

स्वाभाविक ही उन्होंने अनेक भाषाओं का ज्ञान हासिल किया था। एशियाटिक सोसाइटी में जर्नल में ए नोट ऑन तुलसीदास रिलीजियस रिफॉर्म और विद्यापति ठाकुर जैसे लेख लिखकर उन्होंने इन दोनों महाकाव्य के महत्व को रेखांकित किया था। जिसने निश्चय ही हिंदी भाषी विद्वानों को तुलसीदास और विद्यापति के प्रति अध्ययन चिंतन की धारणा को प्रभावित किया हिंदी क्षेत्र की विभिन्न भाषाओं में मौजूद था गीतों का संकलन विश्लेषण और अनुवाद का काम भी उन्होंने किया। भाषा सर्वेक्षण के उनके ऐतिहासिक कार्य से तो ज्यादातर लोग परिचित हैं इन्हीं ग्रियर्सन के भाषा और साहित्य चिंतन की विवेचना आलोचक अरुण कुमार ने की है लोक साहित्य भाषाओं के अध्ययन अनुसंधान में ग्रियर्सन की योगदान से इनकार नहीं करते लेकिन भाषा सर्वेक्षण के संदर्भ में स्पष्ट करते हैं कि प्रदेश को बांटकर देखने और उसे एक ना मानने के पीछे ग्रियर्सन की विशेष काम कर रही थी और बिहार में रहते हुए उनकी भाषा किस राज्य की दृष्टि से लगभग भिन्न नहीं थी।

Posted on by