मध्य प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था

 बलवंत राय मेहता समिति की पंचायती राज व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा वर्ष 1977 में अशोक मेहता की अपनी अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई, जिस ने केंद्र सरकार को अपनी सिफारिश वर्ष 1978 में प्रस्तुत कर दी।

वर्ष 1962 में प्रथम बार मध्य प्रदेश पंचायत अधिनियम लागू किया गया।

मध्य प्रदेश में जिला पंचायत का चुनाव पहली बार वर्ष 1971 में हुआ।

वर्ष 1981 में राज्य सरकार द्वारा मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम के रूप में स्वीकृत हुआ। इसमें राज्य में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की बात की गई ।

पंचायती राज व्यवस्था को सर्वप्रथम सर्वप्रथम संवैधानिक दर्जा देने की सिफारिश लक्ष्मी मल्ल सिंघवी ने वर्ष 1986 में की थी। लोकायुक्त विधेयक मध्यप्रदेश विधानसभा द्वारा वर्ष 1981 में पारित किया गया। मध्य प्रदेश के प्रथम लोकायुक्त टीवी दीक्षित है।

संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार, 29 दिसंबर 1993 को राज्य विधान सभा में मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम विधेयक प्रस्तुत किया गया जिसे विधानसभा द्वारा 30 दिसंबर 1993 को पारित कर दिया गया इसे जनवरी 1994 को लागू किया गया, तत्पश्चात पंचायत व नगरीय प्रशासन का चुनाव संपन्न कराने के लिए 19 जनवरी 1994 को मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग का गठन किया गया।

मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन के प्रथम आयुक्त लोहानी थे।

मध्य प्रदेश में सतर्कता आयोग की स्थापना 1964 में की गई।

ग्राम पंचायतों के सरपंच के मामले में निर्वाचन प्रक्रिया की जिम्मेदारी राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर करेगी, जबकि जनपद एवं जिला पंचायतों के मामलों में सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान प्रणाली के माध्यम से चुने हुए सदस्यों द्वारा किया जाएगा। 

ग्राम पंचायत में हजार तक जनसंख्या वाले कम से कम 10 वार्ड तथा उससे ऊपर की जनसंख्या वाली ग्राम पंचायत के लिए अधिकतम 20 वार्ड जरूरी है परंतु प्रत्येक वार्ड में जनसंख्या की क्षमता भी जरूरी है। सर प्रथम ग्राम न्यायालय 2001 को नीमच जिले के जनपद को झांतला ग्राम पंचायत में आरंभ हुआ। इसके अंतर्गत अनुसूचित जाति जनजाति व अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ दिया जाता है। इस व्यवस्था में महिलाओं को 50% आरक्षण प्राप्त है।

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