हर कंपनी वर्ष के अंत में अंतिम खातों को तैयार हो जाने के पश्चात अपने अंतर नियमों के अनुसार संचालकों की सिफारिश पर लाभांश की घोषणा करती है। संचालक गण कंपनी की भाभी स्थिति को ध्यान में रखकर तथा संस्था की स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिए दृष्टिकोण से लाभ के कुछ भाग को संचित खाते में हस्तांतरित करने के पश्चात से लाभ को ही लाभांश के रूप में बैठते हैं। उन्हें ध्यान में रखना चाहिए कि लाभांश की दर में वर्ष प्रति वर्ष अधिक उच्च वचन ना हो स्थिति दर्शक था कि सुधार आर्थिक स्थिति का परिचायक होता है और इससे उसकी ख्याति भी बढ़ती है इसी उद्देश्य से लाभांश संकरण कोष का जन्म किया जाता है और लाभ के कम होने पर इस कोष की सहायता से लाभांश की दर को बनाए रखा जाता है यदि लाभ की मात्रा साधारण से अधिक हो तो या उचित होगा कि लाभांश के दर को अधिक बढ़ाने के स्थान पर अधिक लाभ का पूंजीकरण कर लिया जाए और इस प्रकार उसे बोनस के रूप में धारियों को बांट दिया जाए। बोनस की नकदी के रूप में बांटा जा सकता है परंतु यदि कंपनी की रोकड़ की स्थिति इस योग्य ना हो तो उसे अंशु के रूप में बांटना चाहिए। अंतिम लाभांश की घोषणा के पश्चात उसके भुगतान का प्रबंध भी कंपनी को करना चाहिए या भुगतान घोषणा के बाद 30 दिन के अंदर होना चाहिए। कभी-कभी कंपनी के पास पर्याप्त होने के कारण इसके भुगतान की समस्या संचालकों के सामने आती है इसका हल तीन प्रकार से किया जा सकता है ।
यदि रुपया स्टार्ट अखबारों के पास पैसा है और शीघ्र ही मिल जाने की संभावना हो तो कंपनी को बैंक से अधिक लेकर इसके भुगतान की व्यवस्था करनी चाहिए।
परंतु यदि स्थाई संपत्ति के करने के लिए या दीर्घावधि के लिए उपयोग किया गया हो तो उस दशा में उचित या होगा कि शोध पत्र जारी करके रुपया प्राप्त किया जा सकता है।
तीसरा विकल्प दिया है कि नकद लाभांश देने के स्थान पर बोनस अंशों का निर्गमन कर दिया जाए इससे भविष्य में कंपनी पर और अधिक लाभांश का बढ़ जाएगा।
लाभांश की घोषणा के पश्चात कंपनी एक लाभांश की सूची तैयार करती है तथा उसकी सहायता से लाभांश अधिपत्र तैयार करती है। इन लाभांश अधिपत्र ओं को अनुज धारियों के पास भेज दिया जाता है। कभी-कभी कंपनी समाचार पत्रों में इस आशय की एक सार्वजनिक सूचना भी प्रकाशित कर आती है। इससे इन अधि पत्रों के खो जाने पर अंश धारियों को सूचना प्राप्त होने का भय नहीं रहता।