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इस तकनीक के ज्ञाता लेस्टर विश्वविद्यालय, इंग्लैंड के आनुवंशिकी विद प्रो. अलेक जेफरीज को जाता है, जिन्होंने 1985 में इस तकनीक का विकास किया था।
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भारत में इस विधि के आविष्कार का श्रेय डॉ. लालजी सिंह को है, जो हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आणविक जीन विज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) के निदेशक थे।
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1988 में डॉ. वीके कश्यप ने भारत में इसकी कानूनी स्वीकृति के लिए प्रयास आरंभ किया।
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पितृत्व सिद्ध करने के लिए 1989 में तलशेरी (केरल) में एक प्रसिद्ध मुकदमे में यह रीति सफल सिद्ध हुई। फिर मद्रास उच्च न्यायालय में भी एक मुकदमे में इस रीति को अपनाया गया।
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राजीव गांधी हत्याकांड संबंधी मुकदमे में तनु नामक मानव बम की ठीक से पहचान करने में डीएनए फिंगर प्रिटिंग प्रविधि सफल रही।
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प्रत्येक जीवधारी की समस्त जैविक गतिविधियां कोशिकीय स्तर पर संपन्न होती हैं। मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में पाए जाने वाले डीएनए का तीन प्रतिशत भाग ही जैविकी का नियंत्रक है और यह प्राय: सभी मनुष्यों में समान पाया जाता है।
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डीएनए की संरचना दोहरी कुंडली (डबल हेलिक्स) जैसी होती है। हर कुंडली (फीते) की संरचना शर्करा-फास्फोरस-शर्करा-फास्फोरस से होती है। हर फीते को पाली न्यूक्लिओटाइड कहते हैं।
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इन फीतों को जोड़ने का काम चार नाइट्रोजन क्षार-एडीनीन गुआनीन थायमीन और साइटोसीन करते हैं।