चौसा का युद्व 25 जून 1539 ई0 को शेरखाँ और हूमायॅू के बीच हुआ। इस युद्ध में शेर खाँ विजयी रहा। युद्व में विजय के बाद शेरखाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की थी। हुमायूँ अपना प्राण बचाने के लिया गंगा नदी में कूद गया जहाँ निजाम नामक भिस्ती ने अपनी मश्क से उसे डूबने से बचाया।
विलग्राम या कन्नौज (गंगा के तट पर) का युद्व 17 मई, 1540 में शेरशाह और हुमायॅू के बीच हुआ शेरखाँ विजयी रहा।
विलग्राम युद्व में विजय के बाद शेरशाह ने आगरा एवं दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
विलग्राम युद्व के बाद हुमायूँ सिन्ध चला गया और 15 वर्षो तक निर्वासित जीवन व्यतीत किया।
22 जून 1555 सरहिन्द का युद्ध में हुमायूॅ ने सूर शासक सिकन्दर शाह सूर को पराजित कर दिल्ली के गद्दी पर पुनः बैठा।
दुर्भाग्य से एक दिन दीनपनाह भवन में स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी।
लेनपूल ने लिखा है कि हुमायूँ जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते हुये अपनी जान दे दी।
हुमायूँ अफीम का बहुत शौकीन था।
हुमायूँनामा ग्रन्थ की रचना उसकी बहन गुलबदन बेगम ने किया था।