भारतीय स्रोतों स को को सी टी एन नाम देते हैं एवं शासकों के पश्चात शक भारत में आए इन्होंने यमन शासकों से भी अधिक भू भाग पर अधिकार कर लिया था शक 5 शाखाओं में विभाजित है प्रथम शाखा काबुल में थी द्वितीय साका तक्षशिला में थी तीसरी शाखा मथुरा में थी तथा चतुर्थ शाखा उज्जैनी में थी तथा पंचम शाखा नाशिक में अपना प्रभुत्व स्थापित किए हुए थी भारत में शक शासक क्षत्रप कहलाते थे।
मथुरा के साथ पहले मालवा क्षेत्र में रहते थे 57 ईसा पूर्व में उज्जैन के एक राजा ने इन सको को युद्ध में पराजित कर उन्हें बाहर खदेड़ दिया और विक्रमादित्य की उपाधि ग्रहण की विक्रम संवत नाम का संवत 57 ईसा पूर्व में शकों पर उसकी विजय से प्रारंभ हुआ।
ध्यान रहे भारतीय इतिहास में विक्रमादित्य की उपाधि इतनी प्रचलित हुई कि जब किसी शासक ने महान प्रक्रम दिखलाया उसने इस उपाधि को धारण कर लिया इसके परिणाम स्वरूप भारत में अब तक कुल 14 विक्रमादित्य हुए गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय सबसे विख्यात विक्रमादित्य हुए।
रुद्रदामन प्रथम सको की सबसे महान शासक हुए जूनागढ़ से प्राप्त 150 ईसा पूर्व का उसका अभिलेख संस्कृत भाषा में लिखित पहला अभिलेख है इस अभिलेख में संस्कृत काव्य शैली का प्राचीनतम नमूना प्राप्त होता है रुद्रदामन ने काठियावाड़ के अर्थ शुष्क क्षेत्र की मशहूर सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार किया या झील मौर्यकालीन थी और दीर्घकाल से सिंचाई के काम में आती थी।
भारत में पल्लव राज्य
पश्चिमी उत्तर भारत में सड़कों के आधिपत्य के पश्चात पार्थयाई लोगों का आधिपत्य स्थापित हुआ पार्थीयाई लोगों का मूल निवास स्थान ईरान था भारतीय शासन में इन्हें पल्लव या पहलव कहा गया था।
पल्लव वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक गोन्दोफर्निश था इस पल्लव शासक की राजधानी तक्षशिला थी गोन्दोफर्निश के शासनकाल में सेंट थॉमस ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए भारत आए थे। पल्लव शक्ति का वास्तविक संस्थापक मिथेड्रेस प्रथम था। पल्लू की शक्ति व प्रभुता का अंत कुषाणों ने किया था।