प्राचीन भारतीय साहित्य में चित्रकला के स्रोत
चित्रलक्षण− यह पृथ्वी लोक में प्राप्त चित्रकला की प्रथम पुस्तक है। इसकी रचना गांधार क्षेत्र के शासक भयजित अथवा नग्नजित (नग्नजित का तात्पर्य हैॉनग्न प्रेतांे पर विजय प्राप्त करने वाला) ने की है। यह उपाधि भयजित को स्वयं व्रह्मा ने दी थी।
भयजित देवशिल्पी विश्वकर्मा का शिष्य था,जिसे पृथ्वी लोक पर पहला चित्रकार माना गया है।
इसकी पुस्तक में चित्रकला से संवंधित विविध तत्वों एवं विधियों पर चर्चा हुयी है।
नोट:- (लाफिर)− चित्रलक्षण से प्रभावित होकर लाफिर ने यह विचार दिया कि भारत में चित्रकला का जन्म राजदरबाारों में हुआ न कि पुरोहितों (धर्म) के प्रभाव में।
ऋगवेद− इसमें चमड़े पर बने अग्नि देवता का चित्र यज्ञशालाओं के स्तम्भों पर बने स्त्रियों के चित्र (ऊषा देवी,रात्रि देवी) का संदर्भ आया है।
महाकाव्य− प्राचीन महाकाव्य में रामायण एंव महाभारत को रखा गया है, जिसमें कथा रामायण की प्राचीन है। जबकि रचना पहले महाभारत की हुयी है।
महाभारत- इसकी रचना 6ठीं एवं 5वीं शताब्दी ई0 पूर्व की मानी जाती है।
इसकी रचना वेदव्यास ने की,जिनका मूलनाम कृष्ण द्धैपायन वेदव्यास है।
महाभारत में आये ऊषा, अनिरूद्ध और चित्रलेखा के प्रसंग से उच्च चित्रकला के दर्शन होते है।
इस पुस्तक में रूपभेद पर चर्चा करते हुए रूपभेद के 19 प्रकार बताये गये है।
महाभारत में सत्यवान को घोड़ों का महान चितेरा बताया गया है,जिसके कारण उसका नाम चित्राश्व पड़ा।
महाभारत में युधिष्ठर की सभा का रोचक वर्णन भी आया है,जिसे चित्रित करने का श्रेय मयसुर नामक चित्रकार को है।
रामायण - (5वीं एवं 4थी शदी ई0 पूर्व)
इसकी रचना महर्षि वाल्मिकी ने की जिनका मूल नाम रत्नाकर था और वे पेशे से डाकू थे।
रामायण में कला को शिल्प नाम दिया गया है। इसके अन्तर्गत गायन,वादन,नृत्य और चित्रकला को रखा गया है।
रामायण में मय नामक शिल्पी द्वारा सीता की स्वर्ण मूर्ति बनाने का वर्णन आया है।
रावण के पुष्पक विमान को चित्रों से अलंकृत करने एवं वाल्मिकी द्वारा लवकुश को वीण वादन सिखाने तथा हनुमान द्वारा (सुन्दरकांड,लंका कांड) में रावण की चित्रशाला एंव चित्र दीर्घा तथा हाथियों के मस्तक पर चित्र बनाने एवं युवतियों के कपोलों पर चित्र बनाने के प्रसंग आये है।
विघजित नामक चित्रकार द्वारा राम के कटे सिर एवं धनुष के छद्म आकृति बनाने के प्रसंगों का उल्लेख हुआ है। साथ ही राम को संगीत वादन तथा चित्र विद्या में पारंगत बताया गया है।
नोट- द्वितीय शताब्दी ई0पू0 में दोनो ही ग्रंथ वर्तमान रूप में आये। चैथी शदी ई0पू0 में (गुप्तकाल) में इनको लिखित रूप दिया गया।
अष्टाध्यायी− यह पाणिन द्वारा रचित पुस्तक है।
इस पुस्तक में पुष्प,पशु पक्षी,नदी,पर्वत आदि को चित्रित करने की विधि बतायी गयी है।
इस ग्रंथ में शिल्प को चारू और कारू में विभाजित किया गया है।
चारू− ललित कला− स्थापत्य,मूर्ति,चित्र,संगीत एवं काव्य।
कारू− उपयोगी कला− बढ़ईगीरी,लुहारगीरी,सुनारगीरी आदि।
ललितकला में काव्यकला अर्थ प्रधान,संगीत कला ध्वनि प्रधान और अन्य कलाएं रूप प्रधान है।
उपयोगी कला यह मानव समाज के लिए उपयोगी होती है।