उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम ग्राहकों को जागरूक करने के साथ-साथ किसी समस्या विशेष के उत्पन्न होने पर उसके विवादों का समाधान भी प्रस्तुत करता है। इस संदर्भ में इसमें त्रिस्तरीय अर्ध न्यायिक तंत्र की स्थापना की गई है, जो निम्न प्रकार है
- जिला मंच धारा (10 - 15)
- राज्य आयोग धारा (16 - 19)
- राष्ट्रीय आयोग धारा (20- 23)
जिला मंच
इस अधिनियम की धारा 9 एवं 10 में जिला मंच का गठन के बारे में निम्नलिखित प्रावधान है
धारा 9(A) के अनुसार राज्य सरकार राजपत्र जारी करके, उपभोक्ता की समस्याओं के समाधान हेतु प्रत्येक जिले में एक या एक से ज्यादा जिला उपभोक्ता मंच का गठन कर सकती है।
गठन धारा 10 (1) के अनुसार इसमें कुल 3 सदस्य होंगे इसमें जिला न्यायधीश (वर्तमान) या बनने की योग्यता रखने वाले अन्य व्यक्ति का सभापति होगा तथा दो अन्य व्यक्ति, जिसमें 1 महिला होगी सदस्य के रूप में शामिल होंगे। जिला मंच के सदस्यों का वेतन व अन्य सेवाएं भत्ते निर्धारित करने अधिकार राज्य सरकार के पास होगा।
अधिकार क्षेत्र ये अधिकार दो आधारों पर दिया जाता हैै, आर्थिक और भौगोलिक।
आर्थिक आधार आर्थिक रूप से 5 लाख तक के मामलों की सुनवाई यह मंच करेगा।
भौगोलिक आधार जिला मंच में शिकायत करने वाला व्यक्ति उस जिले का निवासी हो अथवा वह वहांँ व्यवसाय संचालित करता हो या उसकी शाखा कार्यालय वही हो।
शिकायत प्रस्तुत करने की प्रक्रिया
धारा 12 के अनुसार कोई भी उपभोक्ता जिससे माल बेचा गया हो या बेचने का अनुबंध किया गया हो वह स्वयं या उसकी मान्यता प्राप्त होता संघ सदस्य या असदस्य के लिए शिकायत प्रस्तुत करने का अधिकारी होता है। लिखित शिकायत का प्रारूप निम्न प्रकार होगा
- शिकायतकर्ता का नाम
- शिकायत से संबंधित तथ्य प्रमाणित करने वाला प्रमाण पत्र
- विरोधी पक्षकारों के नाम /पते
- शिकायत कर्ता के हस्ताक्षर
निर्णय की अवधि
- यदि उपभोक्ता द्वारा की गई बिना प्रयोगशाला जांच होती है, तो शिकायत की सूचना प्राप्ति के 90 दिन के अन्दर जिला मंच द्वारा निर्णय दिया जाना आवश्यक है।
- यदि शिकायतकर्ता पक्षकार ने कोई ऐसी शिकायत प्रस्तुत की है, जिसका निर्णय प्रयोगशाला के परीक्षण पर आधारित होगा, तो ऐसी स्थिति में दूसरे पक्षकार को सूचना प्राप्त होने के 150 दिन के अंदर जिला मंच को अपना निर्णय देना आवश्यक है।
न्यायिक शक्तियां
धारा 13 (5) में स्पष्ट किया गया है कि जिला मंच की कार्यवाही के दौरान जो भी कार्रवाई की जाएगी मैं भारतीय दंड संहिता की धारा 193 तथा 228 के अंतर्गत न्यायिक क्रियाविधि मानी जाएगी।
राज्य आयोग
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत राज्य आयोग के संदर्भ में निम्न प्रावधान दिए गए हैं
गठन
अधिनियम की धारा 16 (1) के अनुसार इस आयोग में सभापति सहित कुल 3 सदस्य होते हैं। सभापति की नियुक्ति राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा होगी। वेतन तथा सेवा भत्तों का निर्धारण राज्य सरकार के नाम ही किया जाएगा।
न्यायिक क्षेत्राधिकार
- यदि जिला मंच अपने क्षेत्राधिकार का पालन करने में अनियमितता करता है।
- जिला मंच के निर्णय से यदि कोई पक्षकार संतुष्ट नहीं होता अर्थात् असंतुष्ट होता है।
- 5 लाख से अधिक किन्तु 20 लाख से कम की दावा राशि होने की दशा में
अपील की प्रक्रिया
जिला मंच से दिए गए निर्णय से असंतुष्ट कोई भी पक्ष इसके विरूद्ध राष्ट्रीय आयोग में 30 दिन के अंदर अपील कर सकता है। राष्ट्रीय आयोग समय पर उपभोक्ता द्वारा अपील ना कर पाने पर यदि अपील ना कर पाने के कारणों से संतुष्ट हो जाता है, तो 30 दिन के पश्चात भी अपील स्वीकार कर सकता है।
राष्ट्रीय आयोग
भारतवर्ष में उपभोक्ता के विवादों का हल करने वाली एक स्वतंत्र एवं वैधानिक संस्था है। इसे राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग भी कहा जाता है।
स्थापना एवं गठन
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 9 (3) के अंतर्गत केंद्रीय सरकार राजपत्र अधिसूचना जारी करके इस आयोग की स्थापना कर सकती है। वर्तमान में इस आयोग की स्थापना नई दिल्ली में कर दी गई है। राष्ट्रीय आयोग में कुल 5 सदस्य होते हैं, जिनमें सभापति तथा 4 अन्य सदस्य ,जिनमें एक महिला सदस्य अनिवार्य रूप से होती है। सभापति की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश से परामर्श करने के बाद किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति की जाती है, जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश हो यह रह चुका हो।
न्यायिक क्षेत्राधिकार
- यह आयोग केवल उन दावों की सुनवाई करेगा जिनमें क्षतिपूर्ति की राशि 20 लाख से अधिक होगी।
- राज्य आयोग के निर्णय के विरुद्ध की गई अपील पर पुनर्विचार।
- राज्य आयोग के द्वारा क्षेत्राधिकार का पालन नहीं किया जाता है या कोई असंवैधानिक कार्य किया जाता है, तो ऐसे कार्यों के मामले में यह रिकॉर्ड मांँग सकता है।
अधिकार एवं शक्तियां
राष्ट्रीय आयोग को जनपद न्यायालय का तथा आदेश प्रसारित करने की समस्या प्राप्त है, धारा 21(1) अंतर्गत इन शक्तियों के आधार पर या किसी भी गवाह को बुलावा पत्र भेज सकता है तथा शपथ ले सकता है तथा साक्ष्य प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए आदेश दे सकता है और उनके आधार पर निर्णय भी दे सकता है।