प्रदूषण आज विकसित और विकासशील देशों के लिए कठिन समस्या बन गई है, यह प्रदूषण विभिन्न रूपों में तथा विभिन्न प्रकारों से होता है। यह पर्यावरणीय असंतुलन की स्थिति भविष्य में अत्यधिक भयावह प्रभावों से मानव जाति के विनाश का कारण न बन जाए इसलिए पर्यावरण संरक्षण का विचार अत्यंत आवश्यक है, अर्थात पर्यावरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार घटकों का पता लगाना तथा उस पर नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
पर्यावरण संरक्षण कुछ नहीं सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण के दुष्प्रभावों से लड़ने की योजनाबद्ध व्यूह रचना है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से मनुष्य को पर्यावरण के साथ की गई दमनात्मक त्रुटियों तथा उनके कारण हुए नुकसान का अहसास कराना है। इस संदर्भ में भोपाल गैस कांड के पश्चात वर्ष 1986 में राजीव गांधी के कार्यकाल में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 पास किया गया।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के उद्देश्य
- पहले से व्याप्त विभिन्न विनियम एजेंसी के मध्य समन्वय बैठाना।
- एक प्रदूषण अधिकार की नियुक्ति करना जो प्रदूषण के स्तर की जांँच कर सके।
- पर्यावरण का संरक्षण कर जीवन- स्तर में वृद्धि करना।
- पर्यावरणीय प्रयोगशालाओं की स्थापना।
- देश में जंगल तथा जंगली जीवन की रक्षा करना।
पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जाने वाले उपाय
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की स्थापना के पश्चात पर्यावरण के संरक्षण को प्रदान करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं
- वनस्पति पशु पक्षी कीट पतंगों का संरक्षण
- बढ़ते शहरीकरण पर नियंत्रण
- पर्यावरण सुरक्षा हेतु शिक्षण प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार
- दुर्लभ साधनों का परीक्षण और सीमित साधनों का संरक्षण
- प्रकृति के प्रति सद्भाव व पर्यावरण प्रेम की भावना पैदा करना
- जनसंख्या नियंत्रण हेतु प्रभावी कदम उठाना अति आवश्यक है
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण हेतु सामूहिक प्रयास आवश्यक है
पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाई गई विभिन्न संस्थाएं
- संयुक्त राष्ट्र संघ का आर्थिक आयोग।
- विश्व वन्य जीवन कोष।
- संयुक्त राष्ट्र संघ का पर्यावरण कार्यक्रम।
- अंतरराष्ट्रीय जीव कार्यक्रम।
- यूनेस्को का मनुष्यता तथा जैवमंण्डल कार्यक्रम।