उत्तर पश्चिम भारत में स्वर्ण सिक्कों का सिक्कों का प्रचलन इंडो ग्रीक राजाओं ने करवाया था जबकि इन्हें नियमित एवं पूर्ण रूप से प्रचलित करवाने का श्रेय कुषाण शासकों को जाता है कुषाण शासकों ने स्वयं ताम्र दोनों ही प्रकार के सिक्कों का व्यापक पैमाने पर प्रचलित किया था 78 ईस्वी में कनिष्क कुषाण साम्राज्य का शासक बना कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रतापी शासक था।
कनिष्क ने अपने शासनकाल में गांधार कश्मीर सिंध एवं पंजाब पर अपना आधिपत्य बनाए रखा था। कनिष्क ने 78 ईसवी में संवत प्रचलित किया था जो शक् संवत के नाम से जाना जाता था इसे भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है कनिष्क ने बौद्ध धर्म का संरक्षण प्रदान किया था इसके समय में कश्मीर के कुंडल वन में वसुमित्र की अध्यक्षता में चतुर्थ बौद्ध संगीति आयोजित की गई बौद्ध धर्म महायान और हीनयान में विभाजित हो गया स्वयं महायान के मानने वाले थे कनिष्क ने कश्मीर को जीतकर वहां कनिष्कपुर नामक नगर बसाया। कनिष्का को द्वितीय अशोक भी कहा जाता है ।कनिष्क के शासनकाल में भारत का व्यापारिक संबंध पश्चिमी विश्व के साथ के शासन काल में था तथा कला की दो स्वतंत्र शैलियों का विकास हुआ। गांधार तथा मथुरा कला शैली थी।