लोक उपक्रमों का अंकेक्षण

देश में केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों के द्वारा बहुत बड़ी संख्या में लोग उपक्रमों या लोग उद्यमों की स्थापना की गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इनकी संख्या व इनमें भी नियोजित पूंजी में उत्तरोत्तर एवं आशातीत प्रगति हुई है। यह उपक्रम विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं और अनेक प्रकार की महत्वपूर्ण वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन व वितरण कर रहे हैं। 1951 में केंद्र सरकार द्वारा केवल 5 लोग थे जिनमें केवल 29 करोड़ रुपिया भी नियोजित था। 31 मार्च 1988 को उनकी संख्या बढ़कर 221 हो गई है और उन में नियोजित कुंजी 71299 करोड रुपए है। भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसे उद्यमों की भूमिका आज अत्यंत महत्वपूर्ण है और देश के समग्र विकास में इनका योगदान सराहनीय है।

लोक उद्यम ऊपर वित्तीय नियंत्रण हेतु अंकेक्षण एक प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण साधना है। अंकेक्षण की एक माता इन लोक उपक्रमों पर नियंत्रण की दृष्टि से अत्याधिक है क्योंकि इनमें बहुत बड़ी मात्रा में जनता का धन लगा हुआ है। इनमें अंकेक्षण का उद्देश्य इन उद्यमों में लगी सार्वजनिक पूंजी के को रोकना है और यह सुनिश्चित करना है कि इस पूंजी का व्यवसाय समय वित्तीय औचित्य के समस्त सिद्धांतों का उचित पालन किया गया है। या अभी देखना है कि वेल की राशि संसद द्वारा पूर्णतया स्वीकृति और उसी उद्देश के लिए प्रयोग की गई जिसके लिए उसका वैधानिक निर्धारण हुआ था। 

अंकेक्षण के महत्व को भूतपूर्व नियंत्रण एवं महालेखाकार श्री अशोक चंदा ने निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया है " सभी मान्यता प्राप्त लोकतंत्र में अंकेक्षण एक आवश्यक बुराई की तरह समझा जाता है एक सम्मानित की तरह समझा जाता है जो व्यक्तियों की ओर से की गई क्रिया विधि संबंधी तथा तकनीकी अनियमितताओं एवं त्रुटियों चाहे वे निर्णय की लापरवाही के तथ्यों को बतलाता है। सरकारी कार्यप्रणाली को पारित करने के लिए अंकेक्षण तथा प्रशासन की पूर्व भूमिका स्वयं सिद्ध की तरह मान है ।"

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