सूफी मत: तसव्वुफ पर बल देने वाला मत

सूफी मत मूलतः  दार्शनिक व्यवस्था पर आधारित एक मत था , जिसके कारण ही इस ने इस्लाम धर्म की कट्टरता को तिलांजलि देकर रहस्यवाद की गहराई सड़ अपना नाता जोड़ लिया। ये सूफी सूफिया मनीश होते थे, अर्थात सभी धर्मों से प्रेम करने वाले होते थे। सूफी वही होता है, जो तसव्वुफ या इस्लामिक रहस्यवाद का अनुयायी होता है। तसव्वुफ अथवा सूफीवाद इस्लाम के धार्मिक जीवन की वह अवस्था है, जिसमें बाह्य क्रियाओं की अपेक्षा आंतरिक क्रियाओं पर बल दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, वह इस्लामिक रहस्यवाद का द्योतक है।

सूफी मत के विकास में कई फकीरो ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अबू याजीद उल बिस्तामी एक ऐसे सूफी साधक थे , जिन्होंने सर्वप्रथम फना शब्द का प्रयोग किया । इब्नुल अरबी ऐसे प्रथम सूफी संत थे , जिन्होंने वहदत - उल- वुजूद सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसका सारांश यह है कि भगवान सर्वव्यापी है और सब मे उसी की झलक है उससे कुछ भी अलग नही है और सभी मनुष्य समान हैं। मंसूर हल्लाज प्रथम ऐसे सूफी संत थे जिन्होंने सर्वप्रथम अनलहक शब्द का प्रयोग किया , जिसका तात्पर्य है-  मैं ही ब्रह्म हूँ। भक्ति मत मे जो स्थान मीरा का है वही स्थान सूफी मत में राबिया का है सूफी मत में गुरु को पीर कहा जाता था , जबकि शिष्य को मुरीद कहा जाता था।

          सूफी सिलसिला:-

भारत वर्ष में जिन सूफी मतो का प्रचार प्रसार हुआ , उसे दो  भागो में बाटा जा सकता है-  बाशरा तथा बेशरा। बाशरा सम्प्रदाय, वे सूफी सम्प्रदाय जो सनातन इस्लाम के आचार विचार को मानकर चलते हैं जबकि बेशरा समप्रदाय वाले सूफी साधक इस्लाम के आचार विचार पर इतना ध्यान नहीं देते थे। वे धर्म के सम्बंध में स्वतंत्र प्रकृति के विचार रखते थे । नाना प्रकार के तंत्र मंत्र , जादू टोना इत्यादि के द्वारा लोगों को आकर्षित करना और नशा का सेवन करने का प्रचलन उनमें ज्यादा था। बाशरा सम्प्रदाय में  चिश्ती , सुहरावर्दी , कादरिया ,  नक्शबंदी इत्यादि प्रसिद्ध सिलसिले हैं। 

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