मुगल साम्राज्य के पतन के कारण

           उत्तराधिकार के नियम का अभाव

मुग़ल राजतंत्र में उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था. राजत्व खून के सम्बन्ध को नहीं पहचानता था. गद्दी तलवार के बल पर पारपत की जाती थी. बाबर ने उत्तराधिकार के नियम को  निर्धारित करने की चेष्टा की. उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर एक नई परम्परा की नींव डाली थी. उसने साम्राज्य के विभाजन का आदेश देकर अपने पुत्रों को संतुष्ट रखने का उपाय भी किया था. परन्तु हुमायूँ के शेष भाई उसके शत्रु ही बन गए. हुमायूँ को स्वजनों के विद्रोह का सामना करना पड़ा और अंत में संघर्ष की नीति अपनाकर वह भारतीय साम्राज्य को पुनः  करने में सफल रहा. अकबर हुमायूँ का एकमात्र पुत्र था. फिर भी मिर्जा हकीम जैसे चचेरे भाई  के विद्रोह को उसे दबाना पड़ा था. अकबर को जीवन के अंतिम समय में अपने एकमात्र जीवित पुत्र सलीम के विद्रोह का मुकाबला करना पड़ा.

खुसरो के प्रति अकबर का झुकाव अधिक हो गया था. यह बात सलीम को पसंद नहीं थी. अतः मरने के पहले सलीम की क्षमा याचना से संतुष्ट होकर अकबर ने उसे अपनी उत्तराधिकारी मनोनीत किया. “जैसी करनी वैसी भरनी” का सुन्दर उदाहरण जहाँगीर का शासनकाल था. राज्यारोहण के साथ खुसरो के विद्रोह और पुनः शाहजहाँ के विद्रोह ने जहाँगीर के जीवन का अंतिम दिन कष्टकर बना दिया था. शाहजहाँ को भी अपने जीवनकाल में  के बीच युद्ध देखना पड़ा और अंत में अपदस्थ होकर उसने  के रुप में अपनी साँस ली. औरंगजेब को भी पुत्रों के विरोध का सामना करना पड़ा. शाहजादा अकबर का विद्रोह इसका ज्वलंत प्रमाण है. महान मुग़ल शासकों के द्वारा जो दृष्टांत पेश किया गया उसका पालन औरंगजेब के उत्तराधिकारियों ने किया. गद्दी पर बैठने के लिए खून बहाना, सगे-सम्बन्धियों की हत्या करना एक आम हो गयी थी. शाही परिवार में जो युद्ध होता था उसका प्रभाव राजनीतिक व्यवस्था पर भी पड़ता था. दरबार में दलबंदी और समर्थकों को प्रोनत्ति देकर प्रसन्न रखने की नीति के कारण मुगल साम्राज्य में परस्पर ईर्ष्या की भावना बढ़ी. सत्ता के लिए संघर्ष की परम्परा विकसित कर मुगलों ने खुद साम्राज्य की जड़ को काट डालने की चेष्टा की. शासकों को गद्दी दिलाने और उन्हें उतारने में ही मुगलों का सारा ध्यान केन्द्रित रहने लगा. इसका लाभ उठाकर विरोधी शक्तियों ने स्वतंत्र सत्ता कायम करने में सफलता प्राप्त कर ली.

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