सिक्ख का तात्पर्य शिष्य से लिया गया है इस सिक्ख धर्म का संस्थापक गुरु नानक को माना जाता है, परंतु नानक का अभिप्राय एक नया पन्थ चलाने का नही था। उनके उपदेशो और उत्तराधिकारियों के क्रियाशैली के परिणामस्वरूप सिक्ख पंथ के रूप में एक नए पंथ का सृजन हुआ, जबकि यह मूलरूप से एक सुधारवादी आंदोलन था । इस धर्म के निम्नलिखित प्रमुख सिद्धान्त है-
- ईश्वर सर्वव्यापी है वह निराकार पुरुष है और कण कण में व्याप्त है।
- ईश्वर एक है उसमें अटूट विश्वास होना चाहिए।
- इस पंथ का मूर्ति पूजा में विश्वास नही है।
- यह पंथ जन्म मरण और पुनर्जन्म में विश्वास करता है।
- खालसा धर्म का कर्म में विश्वास है।नानक का ब्रह्म (ईश्वर) राम अलख, अपार, अगम , अगोचर है।
गुरु अंगद(1538-1552):-
गुरु नानक ने अपनी मृत्यु के पूर्व अपने जिस एक प्रिय शिष्य को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, उनका मूल नाम लेहना , जबकि अन्य नाम गुरु अंगद का तात्पर्य होता है- The flesh of his own flesh.अर्थात गुरु के शरीर का एक भाग।
गुरु लेहना ने एक नई लिपि गुरुमुखी लिपि चलाई, जिसका उद्देश्य अपने गुरु की वाणी को संकलित करना था। इसके पहले उनकी भाषा संस्कृत थी । गुरुमुखी लिपि देवनागरी लिपि से ही निःसृत है।गुरु नानक के लोक कल्याण के उपदेशों का संग्रह करके उन्होंने मानव जाति पर बड़ा उपकार किया । गुरु अंगद ने ही लंगर प्रथा को भी प्रारम्भ किया , जो कि एक प्रकार से निःशुल्क सामूहिक भोज था । इस लंगर प्रथा का उद्देश्य लोगो मे एकता तथा परस्पर प्रेम की भावना को जाग्रत करना था। उन्होंने ही गुरुमुखी लिपि का पुनर्नवीनीकरण किया तथा उसके व्याकरण मात्राओ की रचना की ।
गुरु अंगद ने भी जातिगत भेदभाव की भावनाओं की आलोचना की। इस प्रकार गुरु अंगद ने सिक्ख धर्म को एक बेहतर संगठित धर्म के रूप में परिणत कर दिया।