चिश्ती सिलसिला

अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ आईने अकबरी में अपने समकालीन कुल चौदह सूफी सिलसिलो की चर्चा की है। इसमे जो सिलसिला भारत मे लोकप्रिय हुआ, वह क्रमशः चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरिया तथा नक्शबंदी सिलसिला था इसमे भी जो सिलसिला सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ वह चिश्ती सिलसिला है। चिश्ती सिलसिला की जन प्रियता का कारण यह था कि उन्हें भारतीय परिस्थितियों का ज्ञान था और उन्होंने कुछ हिन्दू रीति रिवाजों को अपना लिया था। चिश्ती सम्प्रदाय के प्रवर्तक ख्वाजा अबू अब्दाल चिश्ती थे।

         भारत मे ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती इस सिलसिले को लाये थे वे तराईन युद्ध के दौरान शिहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी की सेना के साथ दिल्ली आए थे बाद में वे पृथ्वीराज चौहान तृतीय के समय स्थायी रूप से अजमेर में रहने लगे । ख्वाजा को गरीब नवाज कहकर भी पुकारा गया क्योंकि उन्होंने अपना जीवन गरीबो के लिए समर्पित कर दिया था और उन्ही के बीच झुग्गी बनाकर फ़कीरो के वेश में रहने के कारण फकीरो का बादशाह भी कहा गया। मोइनुद्दीन चिश्ती का सिद्धांत था मानवता की सेवा करना ही ईश्वर के सर्वोच्च कोटि की भक्ति है हिन्दुओ के प्रति उनका दृष्टिकोण बड़ा उदार था । वे जन साधारण में अत्यंत लोकप्रिय हुए थे 1236 में अजमेर में ही इनकी मृत्यु हो गई वही पर उनकी दरगाह या मज़ार बनाई गई। आज भी उनकी कब्र पर प्रतिवर्ष उनके पुण्यतिथि के अवसर पर मार्च अप्रैल में उर्स का मेला लगता है इसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। ख्वाजा साहब की दरगाह की मस्जिद अकबर बादशाह की बनवाई हुई थी। सम्राट अकबर साल में एक बार वहाँ जाया करता था।

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