उपभोक्ता के हितों को और अधिक से संरक्षण प्रदान करने हेतु उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 में वर्ष 1991 और वर्ष 1993 में विभिन्न प्रकार के संशोधन किया गया, किंतु आर्थिक वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद में वृद्धि के चलते वह संशोधन नाकाफी साबित हुआ। जिस कारण इस अधिनियम को और अधिक कार्यात्मक और प्रयोजनात्मक बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा एक अत्यधिक व्यापक संशोधन वर्ष 2002 में किया गया। जिसे पूर्ण रूप से 15 मार्च 2003 को विश्व उपभोक्ता दिवस पर संपूर्ण भारत में एक साथ लागू किया गया।
संशोधन में मुख्य बातें निम्नलिखित थी
- राष्ट्रीय आयोग और राज्य आयोगों की पीठों का सृजन और सर्किट बैचोंं का आयोजन।
- उपभोक्ता मंचों के अध्यक्ष के किसी कारणवश अनुपस्थित रहने पर वरिष्ठतम सदस्य द्वारा मंच की अध्यक्षता का प्रावधान।
- अप्रमाणिक वस्तुओं/सेवाओं की अनुचित व्यापार पद्धति में शामिल करना।
- विभिन्न स्तर पर कार्यरत प्रत्याशियों की धन संबंधी अधिकारिता में संशोधन।
- जिला मंच 20 लाख तक
- राज्य आयोग 20 लाख से एक करोड़ तक
- राष्ट्रीय आयोग एक करोड़ से ऊपर
जिला स्तर पर उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना।
प्रतितोप एजेंसी द्वारा आदेश क्षतिपूर्ति राशि को प्रमाण पत्र केस के माध्यम से उसी रीति से वसूली की जा सकती है। जिस रीती से भू राजस्व की वसूली की जाती है।
वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए उपयोग मैं लाई गई सेवाओं और वस्तुओं को उपभोक्ता मंचों के कार्य क्षेत्र से निकाल दिया गया है।