बाबा फरीद के शिष्यों में निजामुद्दीन औलिया का नाम सबसे प्रसिद्ध है। इनके समय में चिश्ती सिलसिले का भारत भर में विकास हुआ । इस लोकप्रियता का मुख्य कारण यह था कि एक विशेष धर्म का अनुयायी होते हुए भी उनमें सामाजिक और धार्मिक कट्टरता लेश मात्र भी नहीं थी साथ ही उनकी विचारधारा में मानव मात्र के लिये अनेक उपयोगी व कल्याणकारी तत्व विद्यमान थे। शेख निजामुद्दीन औलिया का जन्म बदायूं में 1236 में हुआ था । 20 वर्ष की अवस्था में वे बाबा फरीद की ख्याति सुनकर अजोधन जाकर उनके शिष्य बन गए। शेख निजामुद्दीन औलिया को छोड़कर चिश्ती सिलसिले के लगभग सभी सूफी संतो ने वैवाहिक जीवन अपनाया था ।
बाबा फरीद ने बीस वर्ष के इस नवयुवक को अपना खलीफ़ा बनाकर दिल्ली भेज दिया। इसके बाद लगभग साथ वर्षों तक दिल्ली उनके आध्यात्मिक कार्यकलापों का केन्द्र बना रहा। वे नगर से कुछ दूरी पर गियासपुर ग्राम में साधना करते थे। ये एकमात्र ऐसे चिश्ती संत थे , जिन्होंने दिल्ली सल्तनत के सर्वाधिक सात सुलतानो का शासन काल देखा था । परंतु उनका किसी के साथ अच्छे सम्बन्ध नही रहे। वे अक्सर कहा करते थे - मेरे घर के दरवाजे हैं, यदि एक से सुल्तान प्रवेश करते हैं तो दूसरे से मैं बाहर चला जाता हूँ। उनका सबसे खराब सम्बन्ध गयासुद्दीन तुगलक के साथ था।
निजामुद्दीन औलिया की जनप्रियता तथा बुद्धिमतापूर्ण सूफियाना सादगी के कारण अमीर हसन देहलवी ने इन्हें भारत का सादी कहा।