चंद्रगुप्त प्रथम के पश्चात उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना यह लिच्छवी राजकुमारी राजकुमार देवी से उत्पन्न हुआ था। समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टिओं से गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है समुद्रगुप्त के विषय में यद्यपि के शिलालेखों स्तंभ लेखो मुद्राओं व साहित्य ग्रंथों से व्यापक जानकारी प्राप्त होती है परंतु सौभाग्य से समुद्रगुप्त प्रकाश डालने वाली अत्यंत प्रमाणिक सामग्री हरण चरित्र प्रयाग प्रशस्ति के रूप में उपलब्ध है जो इलाहाबाद स्तंभ में है।
राज सिंहासन पर आसीन होने के पश्चात समुद्रगुप्त ने दिग्विजय की योजना बनाई प्रयाग प्रशस्ति अनुसार इस योजना का ध्येय धरणि बन्ध था समुद्र गुप्त वंश का एक महान योद्धा तथा कुशल सेना पति था इसी कारण उसे भारत का नेपोलियन कहा जाता था अपने विजय अभियान को पूरा करने के पश्चात उसने अश्वमेघ यज्ञ उत्पन्न किया था। उसमें विक्रम की उपाधि समुद्रगुप्त का साम्राज्य पूर्व में ब्रह्मपुत्र दक्षिण में नर्मदा तथा उत्तर में कश्मीर तथा तलहटी तक विस्तृत समुद्रगुप्त का उच्च कोटि का कवि था जो कविराज के नाम से कविता लिखा करता था समुद्रगुप्त को उसके सिक्कों का वीणा बजाते हुए दिखाया गया है श्रीलंका के शासक ने गोवर्धन ने गया में एक बौद्ध मंदिर का निर्माण की अनुमति पाने के लिए अपना दूध समुद्रगुप्त के पास भेजा और अनुमति प्राप्त की।