चंद्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' (380 ई से ,413 ई)

समुद्रगुप्त के पश्चात राम गुप्त नामक एक दुर्बल शासक ने शासक के अस्तित्व की जानकारी गोत्र वंशावली में निहित है तत्पश्चात समुद्रगुप्त का नाम है चंद्रगुप्त द्वितीय राम गुप्त का अनुज था चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य अपने चरणों को को प्राप्त हो गया था चंद्रगुप्त द्वितीय ने वैवाहिक संबंधों और विजय दोनों प्रकार के गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया था इसकी अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक शासक रूद्र सिंह द्वितीय ने करवाया रुद्र सेन की मृत्यु के उपरांत उसका नाबालिक पुत्र गद्दी पर बैठा ऐसे में प्रभावती की वास्तविक शासक या बनी । वाकाटक की सहायता से चंद्रगुप्त ने शंको को पराजित किया इस उपलक्ष में उसने चांदी के सिक्के चलाए जो रूपक कहलाते थे इसके पश्चात चंद्रगुप्त को साकारी कहां गया और उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। चंद्रगुप्त द्वितीय के अभिलेखों मुद्राओं से उसके अनेक नामों वर्ग विरोधियों के विषय में पता चलता है उसे देव श्री विक्रम विक्रमादित्य प्रतिशत सिंह विक्रम सिंह चंद्र परम भागवत अजीत विक्रम विक्रम आदि विरुदों से अलंकृत किया जाता था।

चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा धारण की गई परम भागवत उपाधि से या अनुमान लगाया जा सकता है कि वह वैष्णो धर्म का अनुयाई था चंद्रगुप्त द्वितीय आसाम राज्य पश्चिम से गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर हिमालय तलहटी  से नर्मदा नदी तक विस्तृत था चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में उसकी प्रथम राजधानी पाटलिपुत्र और दूसरी राजधानी उज्जैनी थी यह दोनों ही नगर गुप्तकालीन शिक्षण से प्रसिद्ध केंद्र थे चंद्रगुप्त युति का काल साहित्य साहित्य और कला का स्वर्ण युग कहा जाता है। दिल्ली के कुतुब मीनार के पास खड़े लव स्तंभ पर खुदे हुए अभिलेख में चंद्र नामक किसी राजा का कीर्ति वर्णन किया गया है इतिहासकार उसे चंद्रगुप्त द्वितीय ही मानते हैं चंद्र गुरु जी के दरबार में विद्वानों एवं कलाकारों को आश्रय प्राप्त था उस के दरबार में नवरत्न थे कालिदास धन्वंतरि क्षपणक अमर सिंह संग वेतालभट्ट घटकपर्र पर वह वराहमिहिर आदि थे।

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