निजामुद्दीन औलिया के शिष्यों में अमीर खुसरो सबसे प्रसिद्ध शिष्य थे । अमीर खुसरो से निजामुद्दीन इतने प्रभावित थे , कि उन्होंने एक बार कहा था , " हे अल्लाह अमीर खुसरो के प्रति हमारे अतिशय श्रद्धा के लिये हमें माफ करना।" अमीर खुसरो का वास्तविक नाम अबुल हसन था। उन्होंने चिश्तियों के भीतर मान्यता प्राप्त संगीत को भारतीय जनता के ह्रदय के अत्यधिक निकट ला दिया। चिश्ती परम्परा में बसंत और रंग का प्रवेश ब्रज भाषा में विरचित गीतों का विभिन्न अवसरों पर अनिवार्य रूप से गाया जाना ख़ुसरो की ही देन है। आज भी शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर खुसरो के ब्रज भाषा परम्परा के रूप में गाया जाता था। निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु के समय अमीर खुसरो बंगाल में थें। वे गयासुद्दीन तुगलक के साथ बंगाल के विजय अभियान में गए थे, निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु की खबर मिलते ही वह तुरंत दिल्ली की ओर रवाना हुए निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु की घटना ने उन्हें अन्दर से इतना तोड़ दिया था कि सन 1325 में ही निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु के कुछ समय पश्चात उनकी भी मृत्यु हो गई और उन्हें भी वही दफना दिया गया, जहाँ निजामुद्दीन औलिया को दफनाया गया था।
अमीर खुसरो को निजामुद्दीन औलिया ने तर्कुल्लाह ( भौतिक जगत से पलायन) उपाधि दी थी।