सुहरावर्दी सिलसिले का प्रतिपादक शेख शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी थे , परन्तु भारत मे इसे प्रचारित करने का श्रेय शेख बहाउद्दीन जकारिया को जाता है।
शेख बहाउद्दीन जकारिया :-
शेख बहाउद्दीन जकारिया का जन्म मुल्तान के समीप 1182- 83 में हुआ था। उनके पूर्वज कुरैश कबीले के थे । बहाउद्दीन जकारिया ने मुल्तान व सिंध के गवर्नर नसीरुद्दीन कुबाचा के विरूद्ध अभियान में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। शेख बहाउद्दीन जकारिया ने ही भारत मे सलाम-आलै- कुम शब्द का प्रचलन किया। उन्होंने चिश्तियों द्वारा अपनाये गए कुछ हिन्दुओ के तौर तरीकों को नकार दिया और गुरु को प्रणाम करने के तरीके को बदल कर सलाम-आलै-कुम शब्द प्रयोग आरम्भ हुआ।
फिरोज शाह तुगलक सुहरावर्दी सिलसिले के एक प्रसिद्ध संत शेख जलालुद्दीन का शिष्य था उसने शेख जलालुद्दीन को शेख-उल्ल-ईस्लाम के पद पर नियुक्त् केिया था।
सुहरावर्दी सिलसिले के सिद्धान्त :-
- चिश्तियों के विपरीत सुहरावर्दी संतो ने गरीबी पूर्ण जीवन जीने के बजाए ऐशो आराम की जिंदगी जीने में विश्वास करते थे। सुहरावर्दी संतो ने धन को आध्यात्मिक विकास में बाधक नही माना। कहा जाता है कि शेख बहाउद्दीन मध्य युगीन सूफी साधकों में सबसे अधिक सम्पन्न थे । सुहरावर्दी संतो के अनुसार धन संग्रह बुरा नही है, बल्कि उसका दुरुपयोग बुरा है।,
- चिश्तियों ने जहां समकालीन राजनैतिक शक्तियों से कोई सम्बन्ध नही रखा , वही सुहरावर्दी संत अपने समकालीन सुल्तानों से बराबर सम्पर्क रखते थे।
- सुहरावर्दी सिलसिले के संतों ने चिश्तियों के द्वारा हिन्दुओ के गुरु को प्रणाम करने की प्रथा को अपनाए जाने का विरोध किया। उनके अनुयायी पुराने मुस्लिम पद्धति से सलाम-आलै-कुम से नमस्कार करते थे।