प्रतिक्रिया वादी सूफी मतों में कादरिया सिलसिला एक प्रसिद्ध सूफी सिलसिला था इस सिलसिले के प्रवर्तक अब्दुल कादिर अल जिलानी बगदादी थे। भारत में कादिरी सम्प्रदाय के मूल प्रचारक के सम्बंध में काफी विवाद है। कुछ के अनुसार , भारत इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक मोहम्मद गौस थे , जबकि कुछ अन्य के अनुसार, भारत में इसके प्रवर्तन का श्रेय शाह नियामत उल्लाह को और मखदूम जिलानी को जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर भारत में इसका सर्वप्रथम प्रचार मोहम्मद गौस ने किया था भारत मे कादरिया सिलसिला का प्रवेश सोलहवीं शताब्दी में हुआ । दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी, मोहम्मद गौस से काफी प्रभावित था । यह तक कि उसने अपनी एक पुत्री की भी शादी मोहम्मद गौस से कफ दी थी।
कादरिया सिलसिले के सिद्धान्त :-
- इस सम्प्रदाय में संगीत के लिए कोई स्थान नही था। संगीत को ईस्लाम के विरुद्ध माना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य ईस्लाम धर्म का प्रचार करना था।
- ये लोग धर्म परिवर्तन के प्रबल समर्थक थे इसमे कही भी उत्तरवादिता का स्थान नही है। उदारवादी दृष्टिकोण इनके लिए असहनीय था। ये लोग अपने को खलीफा का शिष्य कहते थे।
मुल्ला शाह बदख्शी :-
कादरिया परम्परा के एक महत्वपूर्ण पीर मियां मीर हुए। उनके उत्तराधिकारी का नाम मुल्ला शाह बादख्शी था। प्रसिद्ध मुगल दारा शिकोह, मुल्ला शाह बादख्शी का ही शिष्य था। दाराशिकोह मुगलो में सबसे विद्वान व्यक्ति था।