सित्तन्नवासल की गुफाएँ (7वीं शदी ई0) (तमिलनाडु)
सित्तन्नवासल की गुफाएँ दक्षिणी तमिलनाडु में तंजौर के समीव पद्दूकोट्टाई से लगभग 9 मील (16 किमी0 लगभग) की दूरी उत्तर-पश्चिम में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है। सित्तन्नवासल शब्द का अर्थ है,जैन सन्तो के सिद्धों का निवास है।
जैन धर्म से संबंधित सित्तन्नवासल की गुफाओं के निर्माण का श्रेय पल्लव नरेश महेन्द्र वर्मन एंव नरसिंह वर्मन (7वीं शदी ई0) को प्राप्त है। किन्तु कलाविद्ध शिवराम मूर्ति इनके निर्माण का श्रेय पाण्डप मारवर्मन को देते है।
यहाॅ के प्रमुख चित्रों में बरामदे की छत में अलंकृत कमल बन है। इस चित्र में एक तालाब जिसमें कमल खिले है, खाली स्थानों में मगर,कछुआ,मछली,जलक्रीडा कर रहे है। और तीन दिव्य आकृतियाँ कमल तोड़ते दिखायी गयी है। जिसमें दो को लाल एंव एक को पीले रंग में चित्रित किया गया है।
स्तम्भों पर कमल तथा नर्तकियाँ,जैन तीर्थकर तथा एक युगल का चित्रांकन है।
यहाॅ पर एक अर्द्ध नारीश्वर का चित्र है,जिसकी शैली अजन्ता एंव बाघ जैसी है।
एक चित्र में हाथ में कमल लिए गन्धर्व को दिखाया गया है।
सित्तन्नवासल शब्द का अर्थ जैन संतो के सिद्धो का निवास माना जाता है।
सित्तन्नवासल गुफाओं का दर्शन सर्वप्रथम टी0एस0 गोपीनाथ ने किया। तथा यहाॅ के भित्ति चित्रों की खोज का श्रेय फ्रांसीसी शोधकर्ता श्री द्रुबील को ही है।
सित्तन्नवासल की गुफायें दक्षिण तमिलनाडु के तंजौर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है।
नोट- इस गुफा में राजा रानी का चित्र भी मिला है,जो अनुमानतः राजा महेन्द्र और उनकी रानी का चित्र है।