गुरु गोविन्द सिंह (1675-2708)

गुरु गोविंद सिंह का जन्म बिहार के पटना में हुआ था।ये सिक्खों के दसवें व अंतिम गुरु थे। इसके बाद गुरु ग्रंथ साहब को गुरु मान लिया गया। इन्होंने अपने विचारों को व्यवहार में परणित करने के लिए1699 में दल खालसा की स्थापना की । लुप्त आदि ग्रंथ को दशम पादशाह का ग्रंथ की संज्ञा से पुनः संकलित करवाया । गुरु गोविंद सिंह ने सिक्खों को सैनिक सम्प्रदाय खालसा में परिवर्तित कर दिया सिक्खों के 5 ककार - केश , कच्छा , कंघा, कड़ा व कृपाण को अनिवार्य कर दिया।उन्होंने पाहुल नामक एक त्योहार चलाया । गोविन्द सिंह ने पहाड़ी प्रदेश में पाओन्टा (हिमाचल प्रदेश) नामक स्थान की स्थापना की थी वहीं पर सैनिको को प्रशिक्षण दिया जाता था जिससे उन्हें लड़ाकू सैनिक बनाया जाए। कृष्ण अवतार नामक ग्रंथ की रचना भी वहीं पर की गई। उनकी आत्मकथा विचित्र नाटक है गुरु गोविन्द  सिंह ने सिक्खों की सैन्य शक्ति की सुदृढ़ता हेतु लौहगढ़, फतेहगढ़, आनंदगढ़ और केशगढ़ के किले निर्मित किये। 80,000 सैनिको की खालसा सेना तैयार की । इनका मुगलो के साथ तनाव पूर्ण सम्बन्ध था 1708 में नांददेढ़ (महाराष्ट्र)  नामक स्थान पर एक  पठान अजीम खां ने उनकी हत्या कर दी। गुरु गोविन्द सिंह हिनफी , संस्कृत तथा फ़ारसी के महत्वपूर्ण विद्वान थे, इन्होनें पुरुष सिक्खों को सिंह और महिला सिक्खों को कौर नामक टाइटिल धारण करने को कहा।इस संबंध में उनका विचार था कि मैं चारो वर्णो को सिंह बना दूँगा और मुगलों को भारत से मिटा दूँगा ।          ध्यातव्य है कि गुरु गोविंद सिंह के नेतृत्व में सिक्ख एक राजनीतिक ताकत बने औरंगजेब की मृत्यु के बाद गुरु गोविंद सिंह ने उसके पुत्र बहादुर शाह का साथ दिया । बहादुर शाह ने गुरु गोविंद सिंह को 5000 जात तथा 5000 सवार का मन सब प्रदान किया था उनकी मृत्युके बाद गुरु की परंपरा समाप्त हो गई तथा सिक्खों का नेतृत्व बंदा बहादुर ने संभाला । 

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