सब बदला पर वो ना बदला

कभी-कभी पर्यावरण का मामला सिर्फ खादी भंडार के कुर्ते पहनने वालों और अक्सर दाढ़ी रखे हुए पुरुष और खादी का वैसा ही कुर्ता पहन ने वाली जरा कदक बड़ी सी बिंदी के अलावा कोई सौंदर्य प्रसाधन इस्तेमाल ना करने वाली महिलाओं तक सीमित था। तब धूम्रपान से कैंसर की खबर ज्यादा आम नहीं थी और इनमें से कई बिड़िया चारमीनार सिगरेट पिया करते थे। उन्हें गंभीरता से कोई नहीं लेता था और लोग उनकी बातों को हंसी में उड़ा दिया करते थे ऐसे लोगों को उपयोगिता को तो मौजूदा गुड ग्राहक सरकार ने ही समझा सरकार को यह समझ में आया कि इन लोगों को अर्बन नक्सल का कठिन का उपयोग लोगों को डराने के लिए किया जा सकता है।

बरहाल मुद्दा यह है कि उस दौर में पर्यावरण को कोई गंभीरता से नहीं लेता था फिर क्या हुआ कि टाई सूट वाले लोग पर्यावरण की बात करने लगे आम चलन यह है कि टाइप वाले जो भी कहते हैं लोग उसे बड़ी गंभीर बात मानते हैं इसलिए ज्यादातर अर्थशास्त्री टाई सूट पहनते हैं इसी वजह से वह हमेशा धंधे में बने रहते हैं।

भले ही अर्थव्यवस्था के बारे में उनकी सारी बातें गलत सिद्ध हो पर्यावरण में टाई सूट वालों के आ जाने से नेताओं वगैरह में भी पर्यावरण की बातें करनी शुरू कर दी अब फैब इंडिया के कुर्ते वाले पुरुष और मेकअप की हुई महिलाएं भी मैदान में आ जाती है यानी पर्यावरण फैशन में आ गया और उनमें जो का माहौल था। वह खत्म हो गया धीरे-धीरे पर्यावरण का मामला और माहौल अंतरराष्ट्रीय हो गया और सरकारों ने पर्यावरण की उपेक्षा करना बंद कर दिया तरह तरह के इवेंट शुरू हो गए प्रचार होने लगा कि प्रदूषण रोकना बहुत जरूरी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अलावा सारी दुनिया ने मान लिया कि पर्यावरण एक गंभीर मुद्दा है इतना सारा बदलाव हो गया लेकिन एक बात नहीं बदली पहले भी ढीले भर का काम नहीं हो रहा था और अब भी नहीं हो रहा है।

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