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पालि और प्राकृत में साहित्य
वैदिक युग के पश्चात पाली और प्राकृत भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं थी। व्यापक रूप से देखने पर प्राकृत ऐसी किसी भी भाषा को इंगित करती थी जो मानक भाषा संस्कृत से किसी रूप से रुप मैं मैं निकली हो, पाली एक प्रचलित प्राकृत है।
बौद्ध धर्म का वैधानिक साहित्य पाली में है जिसे त्रिपिटक कहते हैं। पिटको में है- विनय पिटक, सूत पिटक तथा अभिधम्म पिटक।
अभिधम्म पिटक बौद्ध धर्म की दार्शनिक व्याख्या करता है
जातक कथा भी इन्हीं पिटक साहित्य का एक भाग है।
ये कहानियां बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करती हैं तथा संस्कृत एवं पाली दोनों में उपलब्ध है।
वास्तव में जातक भारतीय जनमानस की साझी विरासत पर आधारित है।
बौद्धों की गीता नाम से प्रसिद्ध धम्मपद का संबंध भी सुत्त पिटक नामक दूसरे बौद्ध महाग्रंथ से है।
संस्कृत में बौद्ध साहित्य भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है जिसमें अश्वघोष द्वारा रचित महान महाकाव्य बुद्धचरितम् में शामिल है।
आचार्य नागसेन द्वारा दार्शनिक संकाय की विषयवस्तु पर आधारित मिलिंदपण्हो पिटकेतर साहित्य में सर्वश्रेष्ठ हैं।
प्राकृत भाषा में जैनों का प्रचार साहित्य लेखन हुआ जिसे जैन आगम कहते हैं। जैनों के आगम में 12 अंग, 12 उपागं, 10 प्रकीणॅ, 6 छांदसूत्र, 4 मूलसूत्र अनुयोग सूत्र तथा नंदिसूत्र की गणना की जाती है।
आगम साहित्य को श्वेतांबर जैन अनुयायी स्वीकार करते हैं, जबकि दिगंबरों का मानना है कि जनों के प्राचीन ग्रंथ अप्राप्य है।
प्राकृत को 'हाल' (300 ई.सन्) द्वारा रचित गाथासप्तशती (700 श्लोक) के लिए भली-भांँति जाना जाता है।
पहाई, महावी, रीवा, रोहा और शशिप्पलहा जैसी कुछ कवियित्रियों को गाथासप्तशती के काव्य संग्रह में शामिल किया गया है।
जैन आचार्य हेमचंद्र (11वीं सदी) ने कोशकला तथा व्याकरण के बारे में बड़ी संख्या में प्राकृत में रचनाएं दी हैं। इनकी प्रसिद्ध रचना प्राकृत पैंगलम है।
राजशेखर की कर्पूरमंजरी आदि भी महत्वपूर्ण प्राकृत ग्रंथ हैं।
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