● अपने चाचा व ससुर जलालुद्दीन खिलजी का वध करके 1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी सिंहासन पर बैठा । उसने अपना राज्याभिषेक बलबन लाल महल में करवाया । अलाउद्दीन के राज्यारोहण के साथ ही सल्तनत के साम्राज्यवादी युग का सूत्रपात होता है ।
● अलाउद्दीन ने अपने राजत्व के लिए न तो इस्लाम के सिद्धांतों का, न उलेमा वर्ग का न ही खलीफा के नाम का सहारा लिया । अलाउद्दीन निरंकुश राजतंत्र में विश्वास करता था । उसने ' यामीन - एल - खिलाफत नासिरी - अमीर - उल - मुमनिनि ( खलीफा का नायक) की उपाधि ग्रहण की ।
● जियाउद्दीन बरनी ने अलाउद्दीन खिलजी के लिए कहा है कि अलाउद्दीन दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसनेे धर्म पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया ।
● अलाउद्दीन ने राजपद के विषय में बलबन के विचार को पुनः जीवित किया । वह राजा की सार्वभौमिकता में विश्वास रखता था जो पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मात्र है । उसने अपनी शक्ति की वृद्धि के विषय में खलीफा की अनुमति लेना आवश्यक नहीं समझा । इसलिए उसने खलीफा से अपने पद की मान्यता प्राप्त करने के संबंध में कोई याचना नहीं की ।
● अलाउद्दीन खिलजी ने अपने आप को यामिन - उसखिलाफत नासिर अमीर - उल - मुमनिन बताया ।
अमीर खुसरो ने अपने ग्रन्थ खाजाइनुल फुतूह में अलाउद्दीन को विश्व का सुल्तान, पृथ्वी के शासकों का सुल्तान, युग का विजेता, जनता का चरवाहा जैसी उपाधियां प्रदान की है । अलाउद्दीन का प्रसिद्ध सेनापति जफर खा मंगोलो के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया, जो अपने समय का श्रेष्ठ और साहसी सेनापति था ।
● जफर खा के शौर्य और भारतीय सेना की दृढ़ता से मंगोल इतने प्रभावित हुए कि वे उसी रात को 30 कोस पीछे हट गए और वापस चले गए ।