अलाउद्दीन खिलजी ( 1296 - 1316 ई. )

● अपने चाचा व ससुर जलालुद्दीन खिलजी का वध करके  1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी सिंहासन पर बैठा । उसने अपना राज्याभिषेक बलबन लाल महल में करवाया । अलाउद्दीन के राज्यारोहण के साथ ही सल्तनत के साम्राज्यवादी युग का सूत्रपात होता है ।

● अलाउद्दीन ने  अपने राजत्व के लिए न तो  इस्लाम के सिद्धांतों  का,  न  उलेमा वर्ग का न ही खलीफा के नाम का सहारा लिया । अलाउद्दीन निरंकुश राजतंत्र में विश्वास करता था । उसने ' यामीन - एल - खिलाफत नासिरी - अमीर - उल - मुमनिनि  ( खलीफा का नायक) की उपाधि ग्रहण की ।

● जियाउद्दीन बरनी ने अलाउद्दीन खिलजी के लिए कहा है कि अलाउद्दीन दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसनेे धर्म पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया ।

● अलाउद्दीन ने राजपद के विषय में बलबन के विचार को पुनः जीवित किया । वह राजा की सार्वभौमिकता में विश्वास रखता था जो पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मात्र है । उसने अपनी शक्ति की वृद्धि के विषय में खलीफा की अनुमति लेना आवश्यक नहीं समझा । इसलिए उसने खलीफा से अपने पद की मान्यता प्राप्त करने के संबंध में कोई याचना नहीं की ।

● अलाउद्दीन खिलजी ने अपने आप को यामिन - उसखिलाफत नासिर अमीर  - उल - मुमनिन बताया । 

अमीर खुसरो ने अपने ग्रन्थ खाजाइनुल फुतूह में अलाउद्दीन को विश्व का सुल्तान,  पृथ्वी के शासकों का सुल्तान,  युग का विजेता, जनता का चरवाहा जैसी  उपाधियां प्रदान की है । अलाउद्दीन का प्रसिद्ध सेनापति जफर खा मंगोलो के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया,  जो  अपने समय का श्रेष्ठ और साहसी सेनापति था ।

● जफर खा के शौर्य  और भारतीय सेना की दृढ़ता से मंगोल इतने प्रभावित हुए कि वे उसी रात को  30  कोस पीछे हट गए  और वापस चले गए ।

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