स्तूप
सर्वप्रथम ऋगवेद में अग्नि की उठती ज्वालाओं को स्तूप कहा गया, जिसका शाब्दिक अर्थ है- खूह या थूहा।
साँची का स्तूप (70 ई0 पू0 से 25 ई0 पू0)
साँची का स्तूप मध्य प्रदेश के रायसेन जिले मे विदिशा से 6 मील की दूरी पर स्थित है।
यह स्तूप सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया था तथा इसकी खोज जनरल टेलर द्वारा 1879 ई0 में की गयी।
यहाँ पर एक बड़े तथा दो छोटे स्तूपों को मिलाकर कुल तीन स्तूपों का निर्माण किया गया।
बड़े स्तूप को महास्तूप कहा गया है। इसमें भगवान बुद्ध के शरीर के अवशेष रखे गये है।
इस स्तूप के निर्माण में लाल रंग के बलुए पत्थर का प्र्रयोग किया गया है, तथा प्रवेश द्वार को सफेद बलुआ पत्थर से निर्मित किया गया है।
शुंग काल में इस स्तूप का कार्य दुगुना कराया गया तथा पक्की ईंटों की संरचना पर पत्थर का आवरण चढ़ाया गया।
भरहुत का स्तूप (185 ई0 पूर्व से 80 ई0 पू0)
यह स्तूप मध्य प्रदेश के सतना जिले से 9 किमी0 की दूरी पर स्थित है।
इसका निर्माण शुंग काल में हुआ और यह शुंगकालीन मूर्तिकला का दूसरा प्रमुख केन्द्र था।
इस स्तूप की खोज कनिंघम महोदय ने 1873 ई0 में की।
इस स्तूप के तल का व्यास 68 फीट था।
वर्तमान में यह स्तूप पूर्णतया नष्ट हो चुका है तथा इसके अवशेष कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित है।