जीव विज्ञान - कोशिका : समसूत्री विभाजन - 01

समसूत्री विभाजन - 

इसे सूत्री कोशिका विभाजन एवं कायिक कोशिका विभाजन भी कहा जाता है। समसूत्री विभाजन (Mitosis, माइटोसिस) की प्रक्रिया को जंतु कोशिकाओं में सबसे पहले जर्मनी के जीव वैज्ञानिक वाल्थर फ्लेमिंग ने 1879 मैं देखा। उन्होंने ही सन् 1882 में इस प्रक्रिया को माइटोसिस (mitos = सूत्र; oisi = अवस्था) नाम दिया।

माइटोसिस की प्रक्रिया को दो भागों में विभाजित कर सकते हैं -  A. केंद्रक विभाजन, B.  कोशिका-द्रव्य विभाजन|

A. केंद्रक विभाजन

केन्द्रक विहाजन की प्रक्रिया पुनः पांच प्रावस्थाओं में पूरी होती है :

(a)   अन्तरावस्था (Interphase, इण्टरफेज) -

         यह विभाजन प्रारंभ होने के पूर्व की अवस्था है। इससे पहले वैज्ञानिक विश्राम की अवस्था मानते थे, परंतु अब यह पता चल चुका है कि यह अत्यधिक क्रियाशील प्रावस्था है। कोशिका विभाजन की पूरी तैयारी इसी प्रावस्था में होती है। इस प्रावस्था में कोशिकांगों का संश्लेषण होता है व कोशिका के साइज में वृध्दि होती है; केन्द्रिक सुस्पष्ट होता है व राइबोसोमों का निर्माण करता है; गुणसूत्रों का निर्माण करने वाले पदार्थ (न्यूक्लिक अम्ल व प्रोटीन) संश्लेषित हो जाते हैं; प्रत्येक गुणसूत्र भी प्रतिकृत हो जाता है अर्थात् प्रत्येक गुणसूत्र की एक-एक हूबहू कॉपी (नकल) तैयार हो जाती है। फलस्वरूप, गुणसूत्रों की संख्या दुगनी हो जाती है, लेकिन अब भी यह सुस्पष्ट नहीं होते व ऊन के उलझे हुए गोले की तरह दिखाई देते हैं।

(b)   पूर्वावस्था (Prophase; प्रोफेज) -

 इस में गुणसूत्र दृष्टव्य होते हैं। कोशिका के वास्तविक विभाजन की शुरुआत प्रोफेज से होती है। इसमें गुणसूत्र सिकुड़ कर छोटे हो जाते हैं (अपनी पूर्व लंबाई का 4% तक रह जाते हैं), इसलिए अब यह लम्बे, पतले सूत्रों की तरह स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र लंबाई में पूरी तरह से दो बराबर भागों में विभाजित हो जाता है इन आधे भाग को अर्ध्दगुणसूत्र (chromatid, क्रोमैटिड) कहते हैं, परंतु पूरी लंबाई में एक बिंदु ऐसा भी होता है जहां दोनों क्रोमैटिड आपस में जुड़े रहते हैं| इसे गुणसूत्र बिन्दु (Centromere, सेण्ट्रोमियर) कहते हैं। केन्द्रिक धीरे धीरे छोटा होता जाता है और लुप्त हो जाता है। जंतु कोशिकाओं व अनेक निम्न श्रेणी के पौधों की कोशिकाओं में (जिनमें तारक काय होते हैं), दोनों तारक केंद्र अलग हो जाते हैं और धीरे-धीरे एक दूसरे के विपरीत ध्रुवों की ओर चलने लगते हैं। प्रोफेज के अन्त तक केंद्रक आवरण भी विघटित हो जाता है तथा तारक केंद्रों में तन्तु जैसी रचनाएं ऐसे निकलती हैं, जैसे किरणें निकल रही हों। इन्हें तारक कहते हैं।

(c). मध्यावस्था (Metaphase, मेटाफेज) -

      इसमें केन्द्रक एवं केंद्रक झिल्ली गुम हो जाती है। यह प्रावस्था काफी छोटी होती है और केवल 2 - 10 मिनट का समय लेती है। इस पर प्रावस्था के शुरू में ही तन्तुओं की एक तर्कु बन जाती है। यह द्विध्रुवी (Bipolar) होती है अर्थात् इसके दो ध्रुव होते हैं -  एक ध्रुव एक तारक से वह दूसरा ध्रुव दूसरे तारक से बनता है। गुणसूत्र अपने-अपने सेण्ट्रोमियर द्वारा तर्कु के तन्तुओं से चिपक जाते हैं व तर्कु के मध्य रेखा (Equator) पर आकर व्यवस्थित हो जाते हैं। गुणसूत्र अत्यधिक संकुचित होकर बहुत छोटे और मोटे भी हो जाते हैं। इस स्थिति में इन्हें आसानी से देखा व गिना जा सकता है।

(d). पश्चावस्था (Anaphase, एनाफेज) -

       यह प्रावस्था अत्यधिक छोटी होती है और केवल दो-तीन मिनटों में समाप्त हो जाती है। इस प्रावस्था में प्रत्येक गुणसूत्र का सेण्ट्रोमियर दो में विभाजित हो जाता है। इस प्रकार प्रत्येक गुणसूत्र के दोनों क्रोमैटिड (जो कि केवल सेण्ट्रोमियर पर ही जुड़े थे) सेण्ट्रोमियर के बटंने के कारण अलग-अलग हो जाते हैं। हम कह सकते हैं कि प्रत्येक गुणसूत्र में दो पृथक्-पृथक् गुणसूत्र बन गए। तर्कु तन्तु सिकुड़ना शुरू होते हैं और प्रत्येक से जो दो गुणसूत्र बने थे, उनमें से एक गुणसूत्र एक ध्रुव की ओर और दूसरा हूबहू गुणसूत्र दूसरे ध्रुव की ओर खींचा चला जाता है। इस प्रकार प्रत्येक गुणसूत्र की एक-एक कॉपी कोशिका के एक भाग में व एक-एक कॉपी दूसरे भाग में चली जाती है। फलस्वरूप कोशिका में दो भागों में गुणसूत्रों के समूह देखे जा सकते हैं और दोनों समूहों में गुणसूत्रों की संख्या बराबर-बराबर होती है।

(e). अन्त्यावस्था (Telophase, टेलोफेज) -

     इस प्रावस्था में होने वाले परिवर्तन प्रोफेज में होने वाले परिवर्तनों के लगभग विपरीत होते हैं। इसलिए यह प्रावस्था प्रोफेज का लगभग उल्टा रूप होती है। इस पर अवस्था में केन्द्रिक तथा केंद्रक का आवरण (दोनों गुणसूत्र समूहों के पृथक्-पृथक्) प्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार दो केंद्रकों का निर्माण हो जाता है। तर्कु लुप्त हो जाती है व गुणसूत्र अकुण्डलित होकर पुनः पतले उलझे हुए धागों का रुप ले लेते हैं, अर्थात् पुनः क्रोमैटिन में परिवर्तित हो जाते हैं। जंतु कोशिकाओं में संतति कोशिकाओं को पृथक् करने के लिए संकुचन होता है तथा पादप कोशिकाओं में संकुचन के स्थान पर ‘कोशिका प्लेट’ बनती है।

शेष अगले नोट्स मे... 

Posted on by