22 मार्च, 1947 को लार्ड माउण्टबेटन भारत के 34 वें और अंतिम ब्रिटिश गवर्नर जनरल बनकर भारत आया ।
भारत आते ही लार्ड माउण्टबेटन ने अनेक समस्याओं हेतु विभिन्न नेताओं से विचार - विमर्श किया ।
इसके बाद माउण्टबेटन ने जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की फिर गांधी जी एवं वल्लभभाई पटेल से विचार - विमर्श किया ।
तत्पश्चात माउण्टबेटन ने जिन्ना, मौलाना आजाद, जे. वी. कृपलानी, कृष्ण मेनन, लियाकत अली तथा सिक्ख प्रतिनिधि बलदेव सिंह एवं मास्टर तारा सिंह से मुलाकात की ।
गांधी जी ने माउण्टबेटन को यह सुझाव दिया था कि अंतिरम सरकार का नेतृत्व जिन्ना के हाथों में सौंप दिया जाय, जिसका कांग्रेसी नेताओं एवं जिन्ना ने भी विरोध किया ।
विभिन्न भारतीय नेताओ से बातचीत के उपरांत माउण्टबेटन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि समस्या का एकमात्र समाधान देश का विभाजन है ।
माउण्टबेटन ने सबसे पहले सरदार वल्लभभाई पटेल एवं जवाहरलाल नेहरू को बंटवारे के पक्ष में किया ।अबुल कलाम आजाद ने कहा " मैं बंटवारे के खिलाफ रहा हूं और अब भी हूं ।"
गांधी जी ने विभाजन का विरोध किया और कहा " यदि सारा भारत भी आग की लपटों से घिर जाए, तो भी मैं पाकिस्तान नहीं बनने दूंगा ।यदि कांग्रेस बंटवारा मंजूर करेगी, तो उसे मेरी लाश के ऊपर करना पड़ेगा, जब तक मैं जीवित हूं, भारत को विभाजित नहीं होने दूंगा"
विभाजन को स्वीकार करने की कांग्रेस की विवशता वल्लभभाई पटेल के वक्तव्य से होती है ।उन्होंने कहा था कि " यदि कांग्रेस विभाजन स्वीकार न करती, तो एक पाकिस्तान के स्थान पर कई पाकिस्तान बनते।"
मौलाना अबुल कलाम आजाद का विचार था कि वल्लभभाई पटेल के प्रभाव के कारण गांधी जी बंटवारे का विरोध न कर सके और समर्थक बन गए ।
लार्ड माउण्टबेटन भारत के विभाजन के मसले पर ब्रिटिश सरकार से बातचीत एवं सहमति प्राप्त करने लंदन गए और पुुुुनः भारत आने के बाद 3 जून, 1947 के अपनी योजना प्रस्तुत की, जिसे माउण्टबेटन योजना के नाम से जानते हैैैं ।