प्रत्येक मनुष्य हमेशा केवल सुख प्राप्त करना चाहता है और अपने सभी काम सुख प्राप्त करने की इच्छा से प्रेरित होकर करता है। मनुष्य जानबूझकर कोई ऐसा काम नहीं करता है जिससे उसे स्वयं सुख प्राप्त करने की कोई आशा ना हो।
मनुष्य के सभी कर्मों की मूल प्रेरक शक्ति 'सुख की इच्छा' है।
1. मृत्यु सुख नहीं है। एक सैनिक देश रक्षा के लिए देश भक्तों के मूल्य के लिए जब जीवन का उत्सर्ग कर देता है उसे सुख नहीं मिलता।
2. हमारे कई समाज उपकारी या परोपकारी काम या आत्महत्या सुख दीक्षा से प्रेरित होकर नहीं बल्कि कर्तव्य की भावना से प्रेरित होकर किए जाते हैं।
3. बटलर के अनुसार "मनुष्य प्रत्येक कर्म केवल सबकी इच्छा से प्रेरित होकर नहीं करता बल्कि उसके कुछ कर्म विशुद्ध परोपकार वृत्तीय कर्तव्य भावना से प्रेरित होते हैं।
4. सुख बाद का विरोधाभास यह बताता है कि सुख मनुष्य को सभी कार्यों का सीधा एवं तात्कालिक प्रयोजन नहीं होता इसका कारण यह है कि सुख को हासिल करने में काम करते समय सुख को भूल जाना आवश्यक होता है।