मुण्डा आन्दोलन ( 1895 - 1901 ई. )

प्रमुख नेता --- बिरसा मुण्डा 

मुण्डा विद्रोह को उलुगरवनी विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है ।मुण्डा जनजाति छोटानागपुर क्षेत्र मेेें निवास  करती है तथा जनसंख्या की दृृष्टि से भारत की बड़़ी जनजातियों मेेेंं गिनी जाती है ।

मुण्डा लोगों में सामूहिक कृषि का प्रचलन था, जिसे खूट कट्टीदार कहा जाता था । किन्तु बाहरी जमींदारों, साहूकारों, ठेकेदारों ने कृषि की इस व्यवस्था को बर्बाद कर दिया ।

मुण्डा जाति के शोषण के सन्दर्भ में अंग्रेजों की मौन स्वीकृति ने इनमें असंतोष को जन्म दिया ।

अपने अधिकारों को वापस लाने के लिए तथा  अपने हितों के रक्षार्थ इन्होंने  ईसाई धर्म भी स्वीकार किया,  किंतु ईसाई मिशनरियो ने भी इनका साथ नहीं दिया ।

मुण्डा  आदिवासियो का विद्रोह  1875 ई. से आरंभ हो गया, परंतु  1895 ई.  से इनका नेतृत्व बिरसा मुण्डा ने किया । बिरसा मुण्डा ने स्वंय को भगवान का दूत घोषित कर दिया और कहा कि उसकी मनवेत्तर शक्तियों के कारण कोई भी लौकिक शक्ति उसे मार नहीं सकती 

1899 ई. में क्रिसमस की पूर्व सन्ध्या पर बिरसा ने  मुण्डा जाति का शासन स्थापित करने के लिए विद्रोह का ऐलान कर दिया ।मुण्डाओ ने जमींदारों, साहूकारों मिशनरियों , आदि सभी बाहरी  लोगोोोों पर  आक्रमण कियेे ।

इस विद्रोह में मुण्डा महिलाओ की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी ।फरवरी  1900  में बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया ।जून  1900 में रांची जेल में हैजा से बिरसा की मृत्यु हो गई । बिरसा के गुरू आनंद पाण्डेय थे ।

1908 के  छोटानागपुर टेेेेनेंसी एक्ट के द्वारा खूूट कट्टीदार के अधिकारो को मान्यता प्रदान की गई तथा जबरन बेेेगार प्रतिबंध लगा दिया ।

वर्तमान में बिरसा को भगवान के रूप में पूजा जाता है ।बिरसा की पूजा पृथक् झारखंड के पैगंबर के रूप में तथा अति वामपंथ के नायक के रूप में होती है ।

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