छह अगस्त को हिरोशिमा और नौ अगस्त को नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर अमेरिका ने कई वैज्ञानिक और रणनीतिक लक्ष्यों को एक साथ साधा था |विश्व विजयी बनना हर ताकतवर देश के तानाशाह का सपना होता है. हिटलर ने भी यही सपना देखा था. एक सितंबर 1939 को पोलैंड पर अचानक हमला करके उसने इस सपने को पूरा करने की शुरुआत की तो यह एक तरह से द्वितीय विश्वयुद्ध की भी शुरुआत थी. सुदूर पूर्व में जापान का राजवंश भी इसी सपने को पूरा करने की लालसा में 1937 से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपना विस्तार कर रहा था. जल्दी ही वह भी द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल हो गया. हिटलर ने ताव में आकर 22 जून, 1941 को सोवियत संघ (रूस) पर आक्रमण कर ‘रूसी रीछ‘ (लंबे समय तक रूस को इसी प्रतीक से दर्शाया जाता रहा है) को छेड़ दिया था. जापान ने भी उन्माद में आकर सात दिसंबर, 1941 को प्रशांत महासागर में स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर धुंआधार बमबारी कर अमेरिका को चुनौती दे दी थी. जापान का यह उकसावा अमेरिका लिए द्वितीय विश्वयुद्ध में कूद पड़ने का खुला न्यौता बन गया.
शुरुआत में ये दोनों देश काफी तेजी से आगे बढ़े. जर्मनी का यूरोप के एक बड़े हिस्से पर कब्जा हो गया तो जापान एशिया-प्रशांत महासागर के बहुत बड़े भू-भाग पर अपना विस्तार कर चुका था. लेकिन 1942 में हवाई के पास जापानी सेना की और 1943 में स्टालिनग्राद में जर्मन सेना की पराजय के बाद किस्मत का पहिया इन दोनों देशों के लिए उल्टा घूमने लगा.अगले दो सालों में ही जर्मनी की हार तय हो गई. अपने 56वें जन्मदिन के 10 दिन बाद, 1945 में 29-30 अप्रैल के बीच वाली रात हिटलर ने बर्लिन के अपने भूमिगत बंकर में पहले तो अपनी प्रेमिका एफ़ा ब्राउन से शादी रचाई और कुछ ही घंटे बाद दोनों ने आत्महत्या कर ली. मरने से पहले हिटलर ने अपनी वसीयत में लिखवाया, ‘मैं और मेरी पत्नी भगोड़े बनने या आत्मसमर्पण की शर्मिंदगी के बदले मृत्यु का वरण कर रहे हैं.’ हिटलर की आत्महत्या के एक ही सप्ताह बाद, सात से आठ मई वाली मध्यरात्रि को जर्मनी ने बिनाशर्त आत्मसमर्पण कर दिया. इस तरह यूरोप में तो द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत हो गया, nskfv एशिया में वह चलता रहा. जापान की भी कमर तो टूट चुकी थी पर वह घुटने टेकने में टालमटोल कर रहा था
अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन का पोट्सडाम शिखर सम्मेलन
जर्मनी की पराजय के दो महीने बाद बर्लिन से सटे पोट्सडाम नगर में 17 जुलाई से दो अगस्त 1945 तक एक शिखर सम्मेलन हुआ. इसमें द्वितीय विश्वयुद्ध के तीन मुख्य विजेता - अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और सोवियत संघ के नेता जोसेफ स्टालिन शामिल थे. इसी बैठक में जर्मनी के विभाजन पर सहमति बनी. इसी सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति ट्रूमैन को यह समाचार मिला कि 16 जुलाई को अमेरिका के लास अलामॉस मरुस्थल में पहले यूरेनियम परमाणु बम का परीक्षण (ट्रिनिटी टेस्ट) सफल रहा है. यह भी कि वैसा ही दूसरा बम (लिटिल बॉय) युद्ध में इस्तेमाल के लिए प्रशांत महासागर के ‘तिनियान‘ द्वीप पर भेजा जा रहा है. उसी दिन चर्चिल को भी यह बात पता चल गई. अपने संस्मरणों में उन्होंने लिखा, ‘अचानक ही वह भयस्वप्न (जापान) गायब हो गया था, उसकी जगह इस सांत्वना देनी वाली संभावना ने ले ली कि अब एक या दो विध्वंसक हमले युद्ध का अंत कर देंगे.’
राष्ट्रपति ट्रूमैन अपनी डायरी में उस बैठक का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि 24 जुलाई के दिन सोवियत नेता स्टालिन से उन्होंने कुछ ऐसे ढंग से, मानो यह कोई बड़ी बात नहीं है, यह कहा कि अमेरिका ने एक ऐसा बम बना लिया है जिससे जापान के होश ठिकाने लगाए जा सकते हैं. स्टालिन ने भी बड़े सहज भाव से कहा कि उसका ‘सदुपयोग’ ही करें तो बेहतर है. समझा जाता है कि अमेरिका की परमाणु बम परियोजना ‘मैनहैटन प्रोजेक्ट’ से जुड़े जर्मनवंशी ब्रिटिश भौतिकशास्त्री क्लाउस फुक्स के जरिये - जो रूसी जासूस भी था - स्टालिन को इस बम की भनक मिल चुकी थी. स्टालिन ने उसी शाम सोवियत गुप्तचर सेवा के प्रमुख लावरेंती बेरिया को हिदायत दी कि 1943 से चल रहे रूसी परमाणु बम के काम में तेज़ी लाई जाए.
‘विशेष बम’ के इस्तेमाल की तैयारी
25 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन ने फिलिप्पीन सागर में स्थित तिनियान द्वीप पर तैनात अमेरिका की प्रशांत महासागरीय वायुसेना के मुख्य कमांडर को पोट्सडाम से ही आदेश दिया कि तीन अगस्त तक ‘विशेष बम’ के इस्तेमाल की तैयारी कर ली जाए. जिस विशेष बम - ‘लिटिल बॉय’ - को तीन अगस्त को गिराने की बात ट्रूमैन कर रहे थे वह यूरेनियम बम था. लेकिन इसके साथ ही एक दूसरा बम ‘फैट मैन’ भी तैयार हो रहा था. यह प्लूटोनियम बम था जिसे ‘ट्रिनिटी’ परीक्षण के दो सप्ताह बाद तैयार कर लिया गया था. हालांकि उसका पूर्ण परीक्षण अभी बाकी था