दक्षिण एशिया में भारत की अवस्थिति

हिन्द महासागर में भारत को केंद्रीय स्थिति प्राप्त है। एशिया महाद्वीप के दक्षिण में तथा हिन्द महासागर के शीर्ष पर स्थित V आकृति  के होने के कारण भारत को भू राजनीतिक तथा वाणिज्य के लिए अनुकूल भौगोलिक स्थिति प्राप्त है। इनमे निम्नांकित लाभ महत्वपूर्ण हैं-

  1.  भारत को  प्रायः उपमहाद्वीप की संज्ञा दी जाती है, जो इसकी स्थिति के कारण ही उल्लेखनीय ढंग से शेष एशिया से अलग एक विशिष्ट भौगोलिक इकाई के रूप में होने के कारण है।
  2. लम्बी समुद्री तट रेखा के कारण यहाँ अनेक उत्तम बन्दरगाह तथा पोताश्रय स्थित हैं जो व्यापार के साथ साथ मत्स्य उद्योग के विकास में भी योगदान देते हैं । इसके अलावा ये सामरिक दृष्टि से भी नौ सेना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  3. संसाधन, खनिज तेल , एवं अन्य खनिज ऊर्जा खनिज की प्राप्ति का क्षेत्र ।
  4. भारत अपनी अनुकूल स्थिति के कारण दक्षिणी एशिया तथा सुदूर पूर्व के कृषि प्रधान व जनसंख्या बाहुल्य देशो तथा पश्चिम के आद्योगिक देशो के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
  5. हिन्द महासागर के शीर्ष पर अपनी स्थिति के कारण विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग भारतीय तट से होकर निकलते हैं। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड , जापान , चीन इत्यादि से समस्त व्यापारिक मार्ग जो पश्चिमी एशिया व यूरोप को जाते हैं, वे भारत से होकर गुजरते हैं, जिनका लाभ हमारे देश को मिलता है।
  6. पश्चिम में स्वेज नहर मार्ग के खुल जाने से उत्तरी अमेरिका यूरोप तथा  भारत के मध्य 4800 किमी की दूरी कम हो गयी है । उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका से भारत स्वेज नहर मार्ग तथा केप ऑफ गुड होप मार्ग दोनों महासागरीय मार्गो से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
  7. मानसूनी जलवायु आकृति के कारण उत्तम कृषि का क्षेत्र है।
  8. अपनी उत्तम स्थिति के कारण ही इसकी जलवायु विभिन्न प्रकार की फसलों व वनों के विकास के अनुकूल है जिसका स्पष्ट प्रभाव यहाँ के आद्योगिक विकास पर भी देखा जाता है।
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