संचालक सामूहिक रूप से संचालक मंडल कहलाते हैं। संचालक मंडल कंपनी का उच्च प्रशासनिक अंग है। यह कंपनी की नीति निर्माण करने वाली उच्चतम निकाय है। प्रत्येक सार्वजनिक कंपनी में (ऐसी सार्वजनिक कंपनी के तरफ से जो की धारा 43 (अ) के अंतर्गत सार्वजनिक कंपनी बन गई है) कम से कम तीन संचालक होना चाहिए जबकि एक निजी कंपनी में कम से कम दो संचालकों का होना आवश्यक है। ऐसे संचालकों को योग्यता अंश लेने की आवश्यकता नहीं होती है। कंपनी अधिनियम 1956 के अंतर्गत संचालकों की कोई अधिकतम संख्या निर्धारित नहीं की गई है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति एक ही समय में अधिक से अधिक 15 कंपनियों का संचालक हो सकता हैै। प्रथम संचालक प्रवर्तकों के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं तथा उनके नाम पार्षद सीमा नियम व अंतनिॅयम में वर्णित किए जाते हैं इसके बाद के संचालक अंश धारियों के द्वारा कंपनी की प्रथम सभा तक प्रत्येक बात वाली सामान्य सभा में नियुक्त किए जाते हैंं। यदि कंपनी के पार्षद अंत नियम कंपनी को अधिकृत करता है तो संचालक मंडल संचालक के 3 महीने से अधिक की अनुपस्थिति के दौरान वैकल्पिक संचालक की नियुक्ति कर सकते हैं।
संचालकों की योग्यताएं
यदि पार्षद अंतनिॅयम के अंतर्गत व्यवस्था में हो तो संचालकों को अपनी नियुक्ति से 2 महीने के भीतर योग्यता अंश प्राप्त कर लेना चाहिए जब तक कि वह पहले से ऐसी धनराशि के अंशों का धारण नहीं करते हो योगिता अंश के प्रावधान में निम्न के संबंध में लागू नहीं होते हैं -
- तकनीकी संचालक
- केंद्रीय सरकार के द्वारा नियुक्त संचालक
- विशेष हितों की अभिव्यक्ति करने वाला संचालक
- एक स्वतंत्र निजी कंपनी