व्यवसाय का सामाजिक व सांस्कृतिक पर्यावरण संपूर्ण व्यवसायिक पर्यावरण का अभिन्न अंग माना गया है। यह स्वीकार करने योग्य है कि समाज व संस्कृति व्यवसाय की आधारशिला है क्योंकि व्यवसाय का जन्म इसी समाज से या समाज के लोगों द्वारा होता है तथा इसका पालन पोषण भी समाज के द्वारा होता है तथा इसका विकास एवं इसकी सफलता देश के सांस्कृतिक पर्यावरण द्वारा ही होता है। सामाजिक तत्व करके कोई भी व्यवसायिक संगठन अपने आप को बचा नहीं सकता कि व्यवसाय के उद्देश्य रखते हैं। मान्यताएं मूल्य विश्वास हो तथा जीवन विद्या एवं शैलियों का गहरा प्रभाव पड़ता है। उपभोक्तावाद एवं सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी महत्वपूर्ण विचारधाराओं ने व्यवसाय को उपभोक्तावाद समाज अभिमुखी बना दिया है।
रेनीकी एवं शॉल में व्यवसाय समाज व संस्कृति के पारस्परिक संबंधों पर प्रकाश डालते हुए इनकी महत्व की चर्चा निम्न शब्दों में की है
"व्यवसाई को लगातार मानवीय आशाओं, भय, आकांक्षाओं, इच्छा, अनिच्छा, प्राथमिकताओं व विचारों के संसार में उपस्थित होकर कार्य करना होता है। वह इनको नकार भी नहीं सकता, उसे मानव समाज इसी संस्कृति, इसके मूल्य पद्धतियों तथा इसके सामाजिक रीति-रिवाजों अंगों का रूपों का आदर करना ही होता है। "
अतः अंत में हम यह कह सकते हैं कि व्यवसाय समाज तथा संस्कृति एक दूसरे में विद्यमान है।