राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद ने 1 अप्रैल, 2002 को आम सहमति से राष्ट्रीय जलनीति 2002 को स्वीकृत प्रदान की जो 1987 कि जलनीति का स्थान लेगी। इस जलनीति में सबके लिए पेयजल की व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की गई है। नई जलनीति में जल संसाधनों के एकीकृत प्रबन्धन और विकास के उद्देश्य से संस्थागत उपाय करने के साथ साथ नदी जल सम्बन्धी विवादों के समाधान के लिए नदी बेसिन संगठन गठित करने पर बल दिया गया है परंतु अंतर्राष्ट्रीय जल विवादों को नई संसोधित नीति के दायरे से बाहर रखा गया है। नई जल नीति में जल संसाधनों के उपयोग की प्राथमिकताए निम्नांकित प्रकार से तय की गई हैं :-
- सभी नागरिकों के लिए पेयजल की उपलब्धता
- सिंचाई के लिए जल व्यवस्था।
- विद्युत उत्पादन हेतु जल की उपलब्धता।
- पारिस्थितिकी सन्तुलन के लिए नदियों में एक निर्धारित सीमा तक निरन्तर जल प्रवाह बनाये रखना ।
- उद्योगों तथा परिवहन के लिए जल का उपयोग । नीति में यह भी प्रावधान रखा गया है कि राज्य अपनी प्राथमिकताओं के अनुरूप इसमे कुछ परिवर्तन कर सकते हैं।
उपयुक्त सर्वहितकारी तथा मितव्ययी योजनाओं का उचित रीति से नियोजन तथा प्रबन्धन किया जाना अपरिहार्य समझा गया है और देश के सभी भागों में जल के समुचित उपयोग को सुनिश्चित करने, इसे प्रदूषण से बचाने तथा इसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने जैसी सभी आवश्यक व्यवस्थायें करना आवश्यक बताया गया है।