राष्ट्रीय जलग्रिड

भारत की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है। कृषि मानसून पर आश्रित है और भारतीय मानसून अनिश्चित एवं अनियमित है। देश मे एक साथ सूखा या जलाभाव बाढ़ या जलप्लावन की स्थिति देखी जाती है।

   देश का धरातलीय जल संसाधन समान रूप से वितरित नही है। जहां देश के पूर्वी भाग (ब्रह्मपुत्र, गंगा और महानदी बेसिनों में) जल की प्रचुरता है वहीं पश्चिमी और मध्यवर्ती भाग में इसकी भारी कमी है ।  वर्षा ऋतु में भी जब देश के एक भाग में बाढ़ होती है तो दूसरा भाग सूखा से प्रभावित होता है। सतही जल के वितरण में इस असन्तुलन को राष्ट्रीय जलग्रिड द्वारा दूर किया जा सकता है। जलग्रिड की संकल्पना केंद्रीय जल एवं शक्ति आयोग द्वारा तैयार की गई जिसके दो संघटक हैं-

  1. जल का पूरब से पश्चिम से प्रवाह
  2. जल का उत्तर से दक्षिण प्रवाह

उद्देशय :-

 राष्ट्रीय जलग्रिड का मुख्य उद्देश्य जल के अन्तरबेसिन अंतरण द्वारा इसके वितरण में प्रादेशिक विषमता को दूर करना है। इस ग्रिड के बारे में सुझाव डॉ. के. एल राव की अध्यक्षता में केंद्रीय जल और शक्ति आयोग द्वारा दिया गया था । इसके निम्न प्रमुख लक्ष्य हैं- :-

  1.  नहरों और नदी बन्धो द्वारा नदियों के अतिरिक्त जल को उत्तर से दक्षिण और दक्षिण पश्चिम तथा पूरब से पश्चिम जल अभाव वाले क्षेत्रों में उपयोग हेतु अंतरित करना,
  2. सागर में बह जाने वाले बाढ़ के जल के जलाभाव और सूखा प्रवण क्षेत्रो की ओर व्यावर्तित करना जिससे जलापूर्ति में असमानता को दूर किया जा सके ।
  3. अतिरिक्त जल का प्राथमिकता के आधार पर दीर्घकालिक सूखा प्रवण क्षेत्रों में उपयोग करना।
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