पृथ्वी की जलवायु में विभिन्न सदियों के दौरान तथा इसके अस्तित्व में आने के बाद ही उतार चढ़ाव आते रहे हैं। ऐसा प्राकृतिक कारको की वजह से होता रहा है । इन कारको में सौर विकिरण अथवा व्यापक ज्वालामुखीय विस्फोटों तथा सूर्य की तुलना में पृथ्वी के झुकाव में बदलाव शामिल है जिनमे पृथ्वी का औसत तापमान प्रभावित होता है। ये उतार चढ़ाव हिमकाल एवं उष्ण काल का सृजन करते हैं। हमारी वर्तमान चिंता के निम्नलिखित कारण हैं:-
- ग्रीनहाउस से निकलने वाली गैसों का वातावरण में जमाव तेजी से बढ़ा है जिससे औसत तापमान बढ़ा है। जिस स्तर पर आने वाले सौर विकिरण और इंफ्रारेड विकिरण की मात्राओं के बीच संतुलन कायम किया जाता है।
- बदलाव की गति काफी तेज है और मानव इतिहास के अब तक के बदलाव की अपेक्षा उसकी मात्रा काफी ज्यादा है।
- इस बदलाव के कारणों में मानवीय गतिविधियों का हाथ ज्यादा है न कि प्राकृतिक कारणों का।
- व्यापक स्तर पर आर्थिक गतिविधियों एवं जनसंख्या को नुकसान होने की आशंका है।
- ग्रीनहाउस गैसों में मुख्य गैस कार्बन डाई ऑक्साइड है । अन्य गैसों में मीथेन, नाइट्रस आक्साइड शामिल हैं। आद्योगिक क्रांति से वातावरण में इन गैसों का जमाव तेजी से बढ़ा है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि तापमान में वृद्धि हो रही है। पिछली एक सदी के दौरान पृथ्वी के औसत तापमान में करीब 0.74 डिग्री से. की बढ़ोतरी हुई है। जलवायु बदलाव सम्बन्धी अंतर सरकारी कमेटी (आईपीसी) के अनुसार ठंडे दिन , ठंडी रातें तथा कुहासे की स्थिति अब कभी कभार ही पैदा होती है जबकि गर्म दिन , गर्म रातें तथा लू लहर की स्थिति आम हो गयी है सन 1970 के आसपास से ही उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में गहन उष्ण कटिबंधीय तूफान में वृद्धि के प्रमाण मिले हैं। इसका उष्ण कटिबंधीय समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि से परस्पर सम्बन्ध है।