यह तथ्य सत्य है कि प्राचीन समय में भारतवासी आपस में मिलकर व्यापार करते थे, जो कि साझा व्यापार के नाम से जाना जाता था। व्यापार से जो लाभ मिलता था उस लाभ को वह किसी एक विधि से आपस में बाटा करते थे परंतु उनके मध्य यदि भविष्य में कोई विवाद उत्पन्न होता था तो वे इस विवाद को राजा या मुखिया के पास ले जाते थे। जिनका हल राजा अपने मंत्रियों से तर्क वितर्क के आधार पर करता था। इसी समस्या को देखते हुए 1872 में भारतीय अनुबंध अधिनियम का निर्माण किया गया जिसके अध्याय 11 वें की धारा 239 से 266 साझेदारी से संबंधित प्रावधान मौजूद थे परंतु यह प्रावधान वर्तमान साझेदारी की समस्या के अनुकूल नहीं थी। अर्थात यह धाराएं विस्तृत एवं पर्याप्त नहीं थी इसलिए भारत में एक अलग साझेदारी अधिनियम की आवश्यकता हुई और सन 1932 में भारत सरकार ने भारतीय साझेदारी अधिनियम पारित कर दिया।
साझेदारी की परिभाषा
भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 की धारा 4 के अनुसार, "साझेदारी उन व्यक्तियों को पारस्परिक संबंध है जिन्होंने किसी ऐसे कारोबार के लाभ को आपस में बांटने का ठहराव किया है जिसे वह सब अथवा उन सब की ओर से कार्य करते हुए उनमें से किसी एक व्यक्ति द्वारा चलाया जाता हो"।
"वे सभी व्यक्ति जिन्होंने परस्पर साझेदारी का समझौता किया है, अर्थात एक दूसरे के साथ साझेदारी में सम्मिलित हुए हैं, व्यक्तिगत रूप से 'साझेदार' तथा सामूहिक रूप से 'फर्म' कहलाते हैं और जिस नाम से उनका कारोबार चलता है वह 'फर्म का नाम' कहलाता है।