कांगो समस्या

नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति की एक बड़ी  उपलब्धि कांगो की आजादी और एकता की रक्षा थी ।कांगो एक  अफ्रीकी देश है, जिसने बेल्जियम से  30  जून,  1960  ई. को आजादी हासिल की थी ।

इसके बाद तांबा से समृद्ध प्रदेश कटांगा ने भी कांगो से आजादी की घोषणा कर दी ।इसके नेता शोंबे को खुलेे रूप मेेें बेेेेल्जियम का समर्थन प्राप्त था ।बेल्जियम ने अपनी फौजें कांगो मेेेंं भेेज दी ।

कांगो के प्रधानमंत्री लुमुंबा ने संयुक्त राष्ट्र,  अमेरिका तथा सोवियत संघ  ( रूस ) से सहायता की अपील की ।संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने महामंत्री दाग हैमशोल्ड को आवश्यक सहायता जुटाने को कहा ।

विदेशी शाक्तियो ने कांगो में अपने समर्थित स्थानीय नेताओं को खड़ा किया ।अमेरिका ने कांगो के राष्ट्रपति कासावब का समर्थन किया, सोवियत रूस ने कांगो के प्रधानमंत्री पेट्रिस लुमुंबा का, जबकि बेल्जियमो ने फौजी नेता मोबुटू का पक्ष लिया । उनके कारनामों से  अंततः लुमुंबा की हत्या हो गई ।

नेहरू ने जोरदार ढंग से मांग की कि संयुक्त राष्ट्र संघ अधिक असरदार भूमिका अदा करे, भाड़े के सैनिकों एवं विदेशी फौजों को निकाल बाहर करें, गृह युद्ध रोके और एक नई सरकार का गठन करवाए ।उन्होंने यह भी कहा कि भारत  इस काम के लिए फौजे भेजने को तैयार है ।संयुक्त राष्ट्र संघ  इससे सहमत हो गया ।

सुरक्षा परिषद ने  21  फरवरी,  1961 ई.  को एक प्रस्ताव पास किया और भारतीय फौजों ने सफलतापूर्वक गृहयुद्ध समाप्त करवाया ।उन्होंने कटांगा प्रदेश तथा समूचे देश पर केंद्रीय सरकार की सत्ता फिर से स्थापित करवा दी ।

इस प्रकार भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति अफ्रीका तथा एशिया के नव - स्वतंत्र देशों की सहायता और संयुक्त राष्ट्र संघ की बहु - आयामी भूमिका के लिए सचमुच गर्व की बात थी ।

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