मनोशारीरिक क्रियाओं के अंतर्गत मानसिक भाषाई, संवेदनात्मक, सामाजिक एवं चारित्रिक विकास आते हैं। इनका विकास विभिन्न आयु स्तरों में भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। मानव विकास एक सतत प्रक्रिया है शायरी विकास तो एक सीमा के बाद रुक जाता है। किंतु मनोशारीरिक क्रियाओं में विकास में अंतर होता रहता है। विभिन्न स्तरों को मानव विकास की अवस्थाएं कहते हैं।
भारतीय मनीषियों ने मानव विकास की अवस्थाओं को साथ कालों में विभाजित किया ।
- गर्भावस्था: गर्भाधान से जन्म तक
- शैशवावस्था :जन्म से 5 वर्ष तक
- बाल्यावस्था :5 वर्ष से 12 वर्ष तक
- किशोरावस्था: 12 वर्ष से 18 वर्ष तक
- युवावस्था: 18 वर्ष से 25 वर्ष तक
- प्रौढ़ावस्था: 25 वर्ष से 55 वर्ष तक
- वृद्धावस्था: 55 वर्ष से मृत्यु तक
इस समय अधिकतर विद्वान मानव विकास का अध्ययन निम्नलिखित चार अवस्थाओं के अंतर्गत करते हैं-
- शैशवावस्था :जन्म से 6 वर्ष तक
- बाल्यावस्था: 6 वर्ष से 12 वर्ष तक
- किशोरावस्था: 12 से 18 वर्ष तक
- वयकावस्था: 18 से मृत्यु तक
शिक्षा की दृष्टि से प्रथम तीन अवस्थाएं महत्वपूर्ण है इसलिए शिक्षा मनोविज्ञान में इन्हीं तीन अवस्था में होने वाले मानव विकास का अध्ययन किया जाता है।