शाहजहाँ (1627-1657ई0) -1
1628 ई0 में शाहजहाँ आगरा में अबुल मुजफ्फर शिहाबुद्दीन मोहम्मद किरान-ए-सानी की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा।
शाहजहाँ ने अपने राज्यारोहण के अवसर पर मुमताज महल को माल्लिका-ए-जमानी की उपाधि दिया। 1631 में बुरहानपुर में उसकी मृत्यु हो गयी जहाँ उसे एक बाग में दफना दिया गया था।
शाहजहाँ ने 1636-37 में सिजदा को समाप्त कर उसके स्थान पर चहार-तस्लीम की प्रथा प्रारम्भ किया।
शाहजहाँ ने कवीन्द्राचार्य की प्रार्थना पर तीर्थयात्रा कर समाप्त कर दिया था।
शाहजहाँ के शासन काल में इब्नहरण ने रामायण तथा मुंशी बनवारी दास ने प्रबोध चन्द्रोदय का गुलजारे हाल नाम से फारसी में अनुवाद किया।
शाहजहाँ ने अपने ससुर आसफ खाँ को वजीर पद प्रदान किया।
शाहजहाँ ने महावत खाँ को खान-ए-खाना की उपाधि प्रदान की।
शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में आगरा में करवाया।
ताजमहल का मुख्य-शिल्पी उस्ताद अहमद खाँ था। इसका मुख्य स्थापत्यकार उस्ताद अहमद लाहोरी था जिसे नादिर-उस-अस की उपाधि दी गयी।
मयूर सिंहासन का निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था। जिसे फारस के आक्रमणकारी शासक नादिर शाह दिल्ली से फारस ले गया।
इसके मुख्य कलाकार वे बादलखाँ थे।
शाहजहाँ के शासन काल को स्थापत्य कला में उत्कृष्टता के कारण मुगल काल का स्वर्ण युग कहा जाता है। शाहजहाँ द्वारा निर्मित प्रमुख इमारते-दिल्ली का लाल किला, दीवाने आम, दीवाने खास, दिल्ली का जामा मस्जिद, आगरा का मोती मस्जिद तथा ताजमहल।
शाहजहाँ के दरबार के मुख्य चित्रकार केा गुणसमुन्दर की उपाधि दी थी।
शाहजहाँँ ने 1638 ई0 में शाहजहानाबाद की नींव डाली थी।
शाहजहाँ के पुत्रांे में दाराशिकोह सबसे विद्वान था।
लेनपून ने दारा को लघु अकबर कहा है।
-शेष अगले भाग में