दास प्रथा-तथ्य ( एक दृष्टि में )

सिंधु सभ्यता में दास प्रथा का प्रचलन नहीं था ।भारत में दास प्रथा की प्राचीनता ऋग्वैदिक काल में प्रचलित थी । पुरुष दास के दान का उल्लेख बहुत कम मिलता है । नारी दासी को दान की वस्तु के रूप में स्वीकार किया गया है। दास कृषि या अन्य उत्पादनात्मक कार्यों में नहीं लगाए जाते थे। उत्तर वैदिक साहित्य में दासों के विषय में जानकारी मिलती है। तैत्तिरीय संहिता से पता चलता है कि दास-दासियों को उपहार में दिए जाने की प्रथा थी। मौर्यकालीन समाज में दास प्रथा के प्रचलन के प्रमाण मिलते हैं। अर्थशास्त्र में 9 प्रकार के दासों का उल्लेख है। कौटिल्य ने दास प्रथा की कानूनी वैधता को स्वीकार किया है। मौर्य काल की एक महत्वपूर्ण सामाजिक घटना कृषि कार्यों में दासों को लगाया जाना था। सर्वप्रथम मौर्य काल में ही दासों को व्यापक पैमाने कृषि कार्यों में लगाया गया। मौर्यकाल के शासक अशोक के अभिलेखों में भी दासों का उल्लेख मिलता है। गुप्तकाल में दास प्रथा विद्यमान थी। नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है। दास मुक्ति के अनुष्ठान का विधान सर्वप्रथम नारद ने किया है। मनु स्मृति में सात प्रकार के दासों का उल्लेख किया गया है ।गुप्तोत्तर काल में दास प्रथा में वृद्धि हुई। उन्हें किसी सामाजिक वर्ग के रूप में नहीं माना गया था। लेख पद्धति के अनुसार वस्तुओं के विनियमन के निर्यात समुद्री मार्ग से पश्चिम देशों को होता था । दास दासियों को दान में देने की प्रथा इस काल में बहुत प्रचलित हो गई थी। बौद्ध मठों और मंदिरों को दान के रूप में दिए जाते थे। चोल साम्राज्य में भी देवदासी प्रथा देवदास प्रथा के भी प्रमाण मिलते हैं। मंदिरों में देव पूजा के लिए रहने वाली को देवदासी कहा जाता था उन्हें नियमित वेतन दिया जाता था। विजय नगर साम्राज्य में भी दास प्रथा प्रचलित थी। मनुष्य के क्रय-विक्रय को बेस-बास कहा जाता था। निकोली कोंटी ने लिखा है कि “ विजय नगर साम्राज्य में विशाल संख्या में दास है, जो कर्जदार अपना ऋण नहीं अदा कर पाते हैं उन्हें सर्वत्र ऋणदाता द्वारा अपनी संपत्ति (दास) बना लिया जाता है।”  मुगल शासक अकबर ने 1562 ईस्वी में दास प्रथा का अंत किया।
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