अनुदान माँगो पर संसद में मतदान हो जाने का मतलब यह नही होता कि सरकार को सार्वजनिक कोष से पैसा निकालने का हक़ प्राप्त हो गया है। लोकसभा द्वारा अनुदानों की माँगो के पारित होने के बाद ,इस प्रकार पारित राशियों और समेकित निधि पर भारित व्यय को पूरा करने के लिए अपेक्षित राशि को समेकित निधि से निकलने की संसद की स्वीकृति विनियोग विधेयक के माध्यम से मांगी जाती है। संविधान के अनुच्छेद 114(3) के अंतर्गत संसद द्वारा ऐसा कानून बनाये बिना कोई भी राशि समेकित निधि से नही निकाली जा सकती। जब सभी अनुदान मांगों पर मतदान हो जाता है तो उनको संचित निधि सहित विनियोजित अधिनियम में एकीकृत कर लिया जाता है और इस प्रकार धन खर्च करने के अधिकार को प्राप्त करने के लिए विनियोग विधेयक को पास करवाने की क्रिया संपादित करनी होती है।इस विधेयक का आशय संचित निधि में से व्यय के विनियोग के लिए सरकार को कानूनी अधिकार देना है। विनियोग विधेयक पर चर्चा उसमे शामिल अनुदानों में निहित लोक महत्व के विषयो पर प्रशासनिक नीति तथा ऐसे मामलों तक , जो अनुदानों की मांगों की चर्चा करते समय पहले उठाये गए हो, सीमित रहती है।इस पर कोई संसोधन पेश नही किया जा सकता।