'मुगल सम्राट अपने प्रशासन का केंद्र बिंदु थे।' आप इस कथन से कहां तक सहमत हैं विस्तृत व्याख्या कीजिए ।

अकबर एक प्रतिभाशाली सम्राट था उसका विश्वास था कि कुशल प्रशासन व्यवस्था के बिना भारत में शक्तिशाली  साम्राज्य की स्थापना करना असंभव है । अतः उसने एक ऐसी कुशल शासन प्रणाली की स्थापना की जो इससे पूर्व के शासकों से श्रेष्ठ थी और जिसे उसके उत्तराधिकारिओं में लगभग 200 वर्षों तक अपनाया ।

सम्राट की स्थिति

मुगल प्रशासन का मुखिया सम्राट होता था । वह एक धुरी के समान था जिसके इर्द-गिर्द सारा प्रशासनिक ढांचा घूमता था । सम्राट अपने आप को ईश्वर का प्रतिनिधित्व मानता था । अबुल फजल ने इस विषय में लिखा है "राजा की शक्ति ईश्वर से फूटने वाला ऐसा प्रकाश है जैसे सूर्य से निकलने वाली किरणें । " वह प्रशासनिक मुखिया होने के साथ-साथ पूजा का धार्मिक मुखिया भी था । वह मुसलमानों से जकात एकत्रित करता था और इसे इस्लाम धर्म के प्रसार में खर्च करता था । न्याय संबंधी सभी व्यक्तियों का स्रोत भी सम्राट ही था । उसके द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध कहीं भी अपील नहीं की जा सकती थी । 

      उसे परामर्श देने के लिए मंत्रियों की व्यवस्था थी ।  परंतु उनके परामर्श को स्वीकार करना या ना करना सम्राट की इच्छा पर निर्भर था । वह जब चाहता इन मंत्रियों को पदच्युत कर सकता था । इस प्रकार हम देखते हैं कि मुगल सम्राट असीम शक्तियों का स्वामी था । असीम शक्तियों के होते हुए भी मुगल सम्राट अपनी प्रजा के हितों का पूरा पूरा ध्यान रखता था । यह बात उनकी दिनचर्या से स्पष्ट हो जाती है प्रातः की प्रार्थना के पश्चात व जनता को झरोखा दर्शन देता था झरोखा दर्शन के पश्चात व दीवान ए आम लोगों की शिकायतें सुनता था तथा उनका उचित समाधान करता था । मुगल सम्राट को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे जिनका वर्णन इस प्रकार है -
* केवल सम्राट के सिंहासन पर बैठ सकता था ।
* सम्राट के अतिरिक्त किसी को भी झरोखा दर्शन देने का अधिकार प्रार्थना था ।
* मृत्युदंड की सजा केवल सम्राट ही दे सकता था ‌
* उपाधियां देने का अधिकार भी सम्राट को प्राप्त था
* वह ही सिक्के जारी कर सकता था ।
* केवल उसे ही किसी शासक के साथ युद्ध करने अथवा संधि करने का अधिकार प्राप्त था ‌
* उसके सिवाय ना कोई शेर का शिकार कर सकता था और ना ही हाथियों की लड़ाई का आयोजन कर सकता था ।

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